देश में दोहरी कर प्रणाली आम नागरिक के लिए असंतोष का कारण बन रही है। पहले वेतन पर आयकर और फिर खर्च पर जीएसटी। यह भी कि सत्ताधारी लोग सुविधाओं में जीते हैं और आम नागरिक मूल जरूरतों के लिए जूझते हैं। कर ढांचा न्याय व समानता पर आधारित होना चाहिए।
भारत का आम नागरिक आज कर व्यवस्था को लेकर गहरे असमंजस में है। उसे लगता है कि उसकी मेहनत और ईमानदारी ही उसके लिए आर्थिक बोझ बनती जा रही है। राष्ट्र निर्माण का दायित्व निभाने वाला यही वर्ग सबसे अधिक दबाव में है। इस असंतोष की जड़ में वह संरचना है जिसे आम भाषा में दोहरी कर व्यवस्था कहा जाता है। कागजों में यह व्यवस्था तर्कसंगत दिखाई देती है। लेकिन धरातल पर यही व्यवस्था नागरिक की जेब और विश्वास दोनों पर चोट करती है।
एक नागरिक महीने भर श्रम करता है। वेतन पाता है। उसी वेतन पर वह आयकर देता है। लेकिन कर यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती। कर कटने के बाद बची हुई आय से जब वह दवा खरीदता है। भोजन करता है। ईंधन भरवाता है। बच्चों की शिक्षा या किसी सेवा का भुगतान करता है तो हर कदम पर उसे वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) देना पड़ता है। सरकार का तर्क है कि आयकर कमाने पर है और जीएसटी व्यय पर। तकनीकी रूप से यह बात सही हो सकती है। लेकिन आम नागरिक के लिए आय का स्रोत एक ही होता है और खर्च भी उसी सीमित राशि से होता है। पैसा वही रहता है। केवल कर के नाम बदल जाते हैं। बोझ कम नहीं होता।
यह पीड़ा तब और गहरी हो जाती है जब नागरिक सत्ता शीर्ष पर बैठे लोगों की जीवनशैली देखता है। प्रश्न तब केवल कानूनी नहीं रह जाता बल्कि नैतिक हो जाता है। आम नागरिक पूछता है कि जब उसने अपनी आय पर कर चुका दिया तो जीवन की हर जरूरत पर दोबारा कर क्यों? लोकतंत्र में इस प्रश्न को असंगत नहीं कहा जा सकता।
कानूनी सच्चाई यह है कि सांसदों और विधायकों का वेतन आयकर के दायरे में आता है और वे कर देते हैं। लेकिन असमानता वेतन में नहीं बल्कि सुविधाओं में है। सरकारी आवास, बिजली- पानी, यात्रा, चिकित्सा, सुरक्षा व स्टाफ जैसी सभी सुविधाओं का बाजार मूल्य अत्यंत ऊंचा है। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को यह या तो मुफ्त मिलता है या नाममात्र शुल्क पर। वहीं आम नागरिक इन्हीं सुविधाओं के लिए अपनी कर देने के बाद बची आय से पूरा भुगतान करता है। कागजों में कर समान है लेकिन जीवन की वास्तविक लागत में गहरी खाई दिखती है। इस असंतुलन को और उजागर करती है उद्घाटन और दौरों की संस्कृति। मामूली से कार्यक्रम के लिए भी नेता विमान या हेलिकॉप्टर से पहुंचते हैं। सुरक्षा के नाम पर लंबे काफिले चलते हैं। सड़कें रोकी जाती हैं। प्रशासनिक तंत्र उसी आयोजन में झोंक दिया जाता है। इन सब पर होने वाला खर्च लाखों और कई बार करोड़ों में होता है। यह खर्च देश के राजस्व से होता है। यानी उसी करदाता के पैसे से जो स्वयं यातायात में फंसा हुआ अपने ईंधन का पूरा मूल्य और कर चुका रहा होता है।
कृषि आय को कर से मुक्त रखने का निर्णय अपने समय में मानवीय और आवश्यक था। खेती जोखिम भरा और मौसम पर निर्भर है। छोटे किसान की आय अस्थिर होती है। लेकिन समय के साथ इस छूट का दुरुपयोग भी बढ़ा। अनेक गैर किसान और प्रभावशाली लोग अपनी आय को कृषि आय दिखाकर टैक्स से बचते रहे। असली किसान तक इस व्यवस्था का कितना लाभ पहुंचा यह आज भी स्पष्ट नहीं। इससे कर व्यवस्था के प्रति अविश्वास और गहराता है।
मूल प्रश्न इससे भी आगे का है। जब नागरिक कर देता है तो बदले में उसे क्या मिलता है। शिक्षा आज भी निजी संस्थानों पर निर्भर है। स्वास्थ्य सेवाएं महंगी हैं। वृद्धावस्था की सुरक्षा सीमित है। रोजगार अनिश्चित है। कर चुकाने के बाद भी जीवन की बुनियादी जिम्मेदारियां नागरिक को स्वयं उठानी पड़ती हैं। ऐसे में कर राष्ट्र निर्माण की साझेदारी नहीं बल्कि मजबूरी जैसा लगने लगता है।
यही अंतर भारत और डेनमार्क जैसे देशों में दिखाई देता है। वहां कर अधिक है, लेकिन बदले में नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की ठोस गारंटी मिलती है। इसलिए कर वहां बोझ नहीं बनता। भारत में कर दरें कम बताई जाती हैं लेकिन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर जोड़ दिए जाएं तो मध्यम वर्ग पर वास्तविक बोझ कहीं अधिक दिखाई देता है। सुविधाएं फिर भी सीमित रहती हैं।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह दोहरी कर व्यवस्था न किसी एक दल की देन है और न ही किसी एक सरकार की। यह आजादी के बाद विकसित हुई कर संरचना का परिणाम है। समय बदला। अर्थव्यवस्था बदली। नागरिक की अपेक्षाएं बदलीं। लेकिन कर व्यवस्था का मूल स्वरूप लगभग जस का तस बना रहा। इसलिए आज यह असहज लगने लगी है। यह आरोप का विषय नहीं बल्कि सुधार का अवसर है। आवश्यकता यह है कि कर सुधार की शुरुआत सत्ता के आचरण से हो। उद्घाटन संस्कृति पर नियंत्रण लगे। हवाई यात्राएं केवल अपरिहार्य स्थितियों में हों। काफिलों का मानकीकरण हो। हर सरकारी दौरे और कार्यक्रम के खर्च का सार्वजनिक विवरण अनिवार्य किया जाए। जब नागरिक देखेगा कि सत्ता स्वयं संयम बरत रही है तब वह कर को बोझ नहीं बल्कि सहभागिता मानेगा।
कर केवल वसूली नहीं बल्कि यह एक सामाजिक समझौता है। नागरिक कहता है कि मैं अपनी मेहनत का हिस्सा दूंगा, क्योंकि राज्य मेरी सामूहिक जिम्मेदारी लेगा। आज नागरिक कर का विरोध नहीं कर रहा। वह कर न्याय की मांग कर रहा है। वह कह रहा है कि मुझसे कर वसूलो, लेकिन पहले यह सिद्ध करो कि सत्ता भी उतनी ही उत्तरदायी और संवेदनशील है जितना एक आम नागरिक को होना पड़ता है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

