महामारी कोरोना ने न धर्म पूछा, न जाति देखी, न व्यवसाय जाना, न घर देखा, न धन देखा, न उम्र देखी, न प्रांत पूछा, न देश देखा, न सरोकार जाना, एक सिरे से सभी को अपनी चपेट में लिया। कोरोना काल में यूं तो ढेरों समस्या, असुविधा, दुःख हमारे जीवन का हिस्सा बने, परन्तु इन प्रतिकूल और भयावह परिस्थितियों में भी हम खुशियां बटोरना सीख गए। कोरोना काल में अंतर्जाल ने पूरे समय हम सभी का साथ दिया और मन बहलाए रखा। ख़ूब सारे सृजन कार्य हुए, चाहे वह लेखन हो या अन्य माध्यम। फेसबुक लाइव, इंस्टाग्राम लाइव, यूट्यूब लाइव, ज़ूम मीटिंग इत्यादि होता रहा। मेरे एक मित्र ने प्रतिदिन इंस्टाग्राम पर लाइव कार्यक्रम किया, जिसमें देश के बड़े-बड़े हस्ताक्षर जिनमें लेखक, कवि, संगीतज्ञ, नर्तक, लोक कलाकार, फ़िल्मी कलाकार, फ़िल्मी कार्य से संबद्ध मशहूर लोग, सामजिक कार्यकर्ता, कला मर्मज्ञ इत्यादि शामिल हुए।
कोरोना के गम्भीर और अतार्किक समय में उचित और सटीक क्या हो, यह कोई नहीं बता पाया। अनुमान, आकलन, अफ़वाह, असत्य, असंवेदनशीलता, आरोप-प्रत्यारोप इत्यादि का भी चारों तरफ़ शोर रहा। हालांकि, कुछ सकारात्मक बातों में एक यह भी रहा कि पूरा परिवार जो कभी एक साथ बैठने को तरसता था, सब एकत्र होकर न सिर्फ़ खाना खाते; बल्कि एक-दूसरे के साथ मिल-बांटकर घर का काम भी निपटाते। कोरोना के कारण लॉकडाउन होने से पर्यावरण पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। आसमान इतना साफ़ और सुन्दर हो गया है कि सहज ही नज़रें आसमान को ताकने लगती हैं। अब आज का न्यू नार्मल यही है कि हम अपनी और दूसरों की सुरक्षा के लिए मास्क पहने रहें।
एक बात जो मुझे शुरू से अचम्भित कर रही है कि कोरोना की पहली लहर में ग्रामीण क्षेत्र इससे प्रभावित नहीं हुआ। मुमकिन है उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक हो। इस बात पर सभी को विचार करना चाहिए कि पहली लहर में आख़िर इस संक्रमण से गांव अछूता क्यों रहा? नगर और महानगर इससे ज्यादा प्रभावित हुए। प्रकृति का रहस्य तो सदा समझ से परे है, परन्तु कोरोना काल में समय ने ‘समय की क़ीमत’ सबको समझा दी है। समय का सदुपयोग कर दुनिया को कैसे सुन्दर बनाया और रखा जाए इस पर चिन्तन, मनन और क्रियाशीलता आवश्यक है। हम ख़ुश रहें कि हम ज़िन्दा हैं; सांसों से नहीं आत्मा से ज़िन्दा हैं।
साभार : साझा-संसार डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम

