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एआई की रील और तबाही की फील

तिरछी नज़र

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पड़ोसी हंसा और खुलासा किया। उसका बेटा बेफिजूल की रीलें बनाता है। एआई की मदद से यह तबाही की रील बनाई है।’ जनकलाल ने माथा पकड़ लिया, ‘तबाही में आनंद खोजती आजकल की नई पौध अजीब है।’

पहले वे फेसबुक प्रेमी थे, अब रील प्रेमी। आजकल उनके मन की रेल फेसबुक की स्टेशन पर नहीं रुकती। रील की पटरी पर दौड़ने लगती है। और फिर दौड़ती हुई किसी मकाम पर नहीं पहुंचती। फेसबुकी मित्रों की पोस्ट रेल यात्रियों की भांति प्रतीक्षालयों में बैठी रह जाती है। उन्होंने जाड़े की जकड़न के दौरान एक अजीब-सी रील देखी और किटकिटाते दांतों तले अंगुली दबा ली। एक शहर में चट्टान की माफिक विशालकाय ओले गिर रहे हैं। ओलों की मार से वाहन चरमरा गए हैं। घरों की छतें टूट रही हैं। सड़कों में छेद हो रहे हैं। उनकी पूरी उम्र निकलने को है पर प्रकृति का ऐसा भयानक मंज़र नहीं देखा!

अगले दिन फिर, वे फेसबुक से होते हुए रील पर जा फिसले। देखा कि उनका शहर बर्फ की चादर में ढंक गया है। चट्टानी ओलों की बारिश ने तबाही मचा रखी है। वे अपने घर से दूर, दूसरे शहर में बैठे चिंता में पड़ गए। अगली रील सरकाते ही किटकिटाते दांतों तले उनकी अंगुली घायल हो गई। उनके घर पर भी ऐसे ही ओलों की बारिश हो रही है। मोहल्ले पड़ोस के लोग भाग रहे हैं। घर की छत विशाल ओले के प्रहार से टूट रही है। इकलौती कार का कचूमर निकला पड़ा है। वे बिलख पड़े। तभी उनके पड़ोसी का बालक मुस्कुराता हुआ रील में दिखाई दिया। उन्हें भारी क्रोध आया, ‘नाशपिटा पड़ोसी।’

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क्रोधावेश में उन्होंने पड़ोसी को फ़ोन लगया, ‘कहां हो भैया? मेरे घर की ये हालत थी तो मुझे एक बार बता देते?’ वह अंजान-सा बोला, ‘जनकलाल जी, क्या हुआ है आपके घर को? मैं तो रोज ही एक चक्कर मार लेता हूं। कहो तो अभी जाकर देख लूं।’ जनकलाल ने उसे आड़े हाथों लिया, ‘अरे! आप क्या देखेंगे? एक फ़ोन करना भी मुनासिब न समझा!’ इस बार पड़ोसी विचलित हो उठा, ‘अभी मैं बात करते हुए आपके घर के सामने पहुंच गया हूं। यहां तो सब ठीक-ठाक दिख रहा है। अंदर जाकर देख लेता हूं। आपकी कार घर के दरवाजे के सामने वैसे की वैसी अड़ी है।’

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जनकलाल चौंके, ‘अरे! मैंने रील में अपने घर को बर्बाद होते देखा है!’ पड़ोसी हंसा और खुलासा किया। उसका बेटा बेफिजूल की रीलें बनाता है। एआई की मदद से यह तबाही की रील बनाई है।’ जनकलाल ने माथा पकड़ लिया, ‘तबाही में आनंद खोजती आजकल की नई पौध अजीब है।’ तभी अगली रील में उन्होंने अपने आप को घर के सामने खड़े पाया, जबकि वे तो यहां हैं? सो बड़बड़ाए, ‘ससुरी रील बुरी, रील की फिसलन बुरी।’

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