कमाल असल में यही होने जा रहा है जनाब कि एआई की वजह से इंसान चर्चा से बाहर जाने को है और कुत्ते चर्चा में आने को हैं। कुत्ते मतलब-रोबोट वगैरह।
देखिए जी, वैसे तो कहावत यह है कि दो पैसे की हांडी गई, कुत्ते की जात पहचानी गई। कुत्ते की यह जात हम इंसानों की तरह से सवर्ण और अवर्णवाली नहीं होती। मतलब वहां जाति व्यवस्था नहीं है। वर्ग व्यवस्था अलबत्ता है। एक वर्ग है सड़क पर रहने वाले आवारा कुत्तों का और एक वर्ग है घरों, कोठियों और फ्लैटों में रहने वाले पालतू कुत्तों का, जो कुत्ते कम होते हैं और घर के सदस्य ज्यादा होते हैं। बल्कि कई बार तो घर के सदस्यों से भी ज्यादा अहम होते हैं। खैर, फर्क यही है जनाब हमारे यहां बंटवारा जाति से होता है, उनके यहां वर्ग से होता है। क्या ही अच्छा होता कि हमारे यहां भी यह भेद वर्ग से होने लगता।
खैर, इधर कुत्ता फिर चर्चा में आ गया। थोड़े दिन पहले अदालत की वजह से चर्चा में आया था, इस बार एआई की वजह से चर्चा में आ गया। कमाल असल में यही होने जा रहा है जनाब कि एआई की वजह से इंसान चर्चा से बाहर जाने को है और कुत्ते चर्चा में आने को हैं। कुत्ते मतलब-रोबोट वगैरह। जैसे एआई से बिना ड्राइवर के गाड़ियां चलेंगी और आपके किराना का सामान ड्रोन आपके घर पहुंचाया करेगा। समस्या सिर्फ इतनी-सी नहीं है कि नौकरियां खत्म हो जाएंगी। मतलब खतरा सिर्फ पेट पर ही नहीं, वजूद पर भी हो सकता है।
खैर, जो भी हो, जनाब यह चिंता तो सरकार करेगी। पर सरकार यह चिंता करती, उससे पहले ही कुत्ते ने उसे चिंता में डाल दिया। लेकिन इस बार जात कुत्ते ने नहीं दिखाई, उन गलगटियन ने दिखाई, जिनके बारे में कबीर बाबा कह गए हैं कि कबीरा तेरी झोपड़ी गलकटियन के पास, करनगे सो भरनगे, तू क्यों भया उदास। असल में उन्हें एक कुत्ता मिल गया था। उन्हें लगा कि यह वही कुत्ता है जो युधिष्ठिर को स्वर्ग के गेट तक लेकर गया था। सो उन्हें यकीन था कि स्वर्ग बस मिलने ही वाला है।
लेकिन यह कुत्ता परंपरागत कुत्तों की किसी श्रेणी में आता ही नहीं था। वह न पालतू था, पालतू होता तो मालिक की रस्सी से बंधकर घूमने निकलता। लेकिन वह आवारा भी नहीं था। वह तो गलकटियन को उस फर्जी डिग्री की तरह मिला था, जो अक्सर हमारे नेताओं के पास पायी जाती हैं। उन्हें फर्जी डिग्री तथा फर्जी कुत्ते में ज्यादा फर्क नहीं लगा होगा। लेकिन फर्जी डिग्री की तरह इस फर्जी कुत्ते को भी लोगों ने पहचान लिया और उसकी जात पता कर ली और बोले अरे यह तो चीनी है। खुद चीनियों ने भी फौरन कह दिया कि हां, यह तो हमारा है। वैसे इतनी जल्दी वे उन हथियारों के बारे में नहीं कहते कि हमारे हैं, जो वे पाकिस्तान वगैरह को देते हैं। खैर, इस चक्कर में जात कुत्ते की नहीं, गलकटियन की पहचानी गयी।

