तालिबानी दमन से त्रस्त अफगानी मीडिया

तालिबानी दमन से त्रस्त अफगानी मीडिया

पुष्परंजन

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ये कूटेंगे, फिर अफसोस करेंगे। महिला पत्रकारों को नौकरी नहीं करने देंगे। मीडिया संस्थाओं को एक-एक करके ताला लगवा देंगे। सत्ता में आये अभी महीना पूरा होने को है, 153 अफग़ान ‘मीडिया आउटलेट’ बंद हो चुके हैं। तालिबान की मीडिया नीति इसी ढर्रे पर चलेगी। सरकारी टीवी आरटीए खोलियेगा, वहां पगड़ी-लबादे में लश्टम-पश्टम एंकर दिखेगा। एकदम कबीलाई अंदाज़ में और पार्श्व में तालिबानी झंडा। पहले जो ज़हीन-सी महिला एंकर शबनम ख़ान दावरान हुआ करती थी, उन्हें टीवी स्टूडियो के गेट से ही भगा दिया गया। उसी सरकारी टीवी चैनल में एक दूसरी महिला एंकर हैं, ख़दीज़ा, जिन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

24 पत्रकारों को 48 घंटों तक हिरासत में रखने और कुछ को नंगा कर बेरहमी से पीटने की कथा अब पुरानी हो चुकी है। तालिबान पत्रकारों से केवल पॉजिटिव ख़बरें चाहता है, चीन की तरह। अंकल सैम ने जिनके लिए सत्ता छोड़कर बोरिया-बिस्तर समेट लिया, वो गुड तालिबान हैं। गार्जियन ने रिपोर्ट की है कि जिस अफग़ानिस्तान में 700 महिला पत्रकार थीं, अब घटकर सौ से भी कम हो गई हैं। सौ से सात पर आ जाएं तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। इस्लामी ख़लीफत ने महिला मामलों के मंत्रालय को भंग कर दिया। एक भी महिला सांसद या ख़बरनवीस न दिखे, उसका इंतज़ाम ये कर चुके हैं। प्रदर्शन में कोई महिला भाग न ले बल्कि प्रदर्शन ही न हो, यही तो चाहते हैं ‘ख़लीफा साहेब’ के नाम से मशहूर सिराज़ुद्दीन हक्कानी, जो गृहमंत्री हैं, जिनके सिर पर सौ मिलियन डॉलर का इनाम अमेरिका ने घोषित कर रखा है। पत्रकार ऐसा कुछ लिखें, जिससे अखुंदज़ादा कैबिनेट के आतंकी चेहरे भलेमानुस लगने लगें।

साढ़े नौ अरब डॉलर रिलीज़ करने की सबसे अधिक चिंता पाकिस्तान को है। यूएन में यही विषय छिड़ा हुआ है। तत्काल एक अरब डॉलर चाहिए। तालिबान के इस कंगले दोस्त पाकिस्तान के विरुद्ध ही तो काबुल में प्रदर्शन हुआ था। अवाम को अभी से लगने लगा है कि पाकिस्तान ने इस देश को उपनिवेश बना लिया है। वो सवाल करने लगे, पंजशीर में पाकिस्तानी वायुसैनिक, उसके कमांडो कर क्या रहे थे? उस दौरान अफग़ान पत्रकार यूनियन के अध्यक्ष फहीम दश्ती की हत्या कर दी गई थी। ये एक-एक कर उन पत्रकारों के सफाये में लगे हुए हैं, जिनका क़द बड़ा रहा है और जिनके अंतर्राष्ट्रीय संपर्क थे।

पिछली सरकार में मीडिया व सूचना केंद्र के प्रमुख थे दावा ख़ान मनपल, उन्हें भी 6 अगस्त, 2021 को तालिबान बंदूकधारी ने मार डाला। जुलाई से अगस्त, 2021 के बीच इन्होंने पांच बड़े पत्रकारों की हत्या कर दी थी। कंधार में 25 अगस्त को ख़ैबर टीवी के दो पत्रकारों अब्दुल मतीन अचकज़ई और कैमरामैन मुहम्मद अली को तालिबान ने बंधक बना लिया था। इस्लामाबाद से मान-मनौव्वल के 48 घंटे बाद ये छोड़े गये। अगस्त से सितंबर तक जो कुछ हुआ, पाकिस्तानी पत्रकार संगठन उसके विरुद्ध मुखर नहीं हुए। वो लोग भी खामोश हैं, जो साउथ एशिया फ्री मीडिया एसोसिएशन चलाते हैं, और लंबी-लंबी छोड़ते हैं। ब्रसेल्स स्थित ‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट’ को यदि इसकी चिंता हुई है तो एशिया में भी सभी पत्रकार संगठनों के बीच ऐक्यभाव की अभिव्यक्ति होनी चाहिए थी।

मगर क्या पत्रकार संगठनों की राजनीति भी उनके लिए आत्मघाती सिद्ध हो रही है? क़ाबुल स्थित अफग़ान नेशनल जर्नलिस्ट यूनियन (एएनजेयू) में अधिसंख्य दारी और ताज़िक भाषी सदस्य बनाये गये हैं। अफग़ान इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट एसोसिएशन (एआईजेए) में पश्तो भाषी सदस्यों का बोलबाला है। अफग़ान नेशनल जर्नलिस्ट एंड रिपोर्टर्स यूनियन (एएनजेआरयू) में मिलेजुले सदस्य हैं। 2002 के बाद दुनियाभर की कंपनियां और सरकारों को अपने आईने में उतारने व फंड के वास्ते इन सभी संगठनों में वर्चस्व की लड़ाई ख़ूब होती रही है।

1925 में क़ाबुल रेडियो की स्थापना हुई थी। इस सरकारी ब्रॉडकास्टिंग कंपनी के लिए 400 वाट के दो ट्रांसमीटर जर्मनी ने टेलीफंकन के ज़रिये लगवाये थे। 1976 में नेशनल रेडियो टेलीविज़न अफग़ानिस्तान (आरटीए) की बुनियाद रखी गई। जापान ने स्टूडियो बनवाना शुरू किया। दो साल बाद 19 अगस्त, 1978 को टीवी प्रसारण अफग़ानिस्तान से आरंभ हुआ। कालांतर में जापान, जर्मनी जैसे देश दुरदुरा दिये गये। दो दशक बाद अफग़ान मीडिया इंडस्ट्री का परिदृश्य बदल चुका था। पैसा बनाने और जनमत तैयार करने में ज़बरदस्त होड़ लगी हुई थी। पत्रकार दरअसल, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए बतौर टूल इस्तेमाल होते रहे।

सऊदी अरब ने अफग़ानिस्तान में वहाबीवाद को मज़बूत करने के वास्ते मीडिया व मदरसों के माध्यम से ख़ूब पैसे बहाये। शेख आसिफ मोहसिनी को मौका मिला तो पश्चिमी काबुल में मस्जिद, शानदार यूनिवर्सिटी बिल्डिंग और मीडिया हाउस तैयार कर लिया। ऐसे सौ से अधिक उदाहरण हैं, जिसमें नेता-उद्योगपतियों का नेक्सस अफग़ान मीडिया इंडस्ट्री को चला रहा था। ईरान ने शिया मीडिया को विस्तार देने के वास्ते 10 से 12 फीसदी हज़ारा कम्युनिटी के लोगों को अपने प्रभामंडल में लेने का प्रयास किया। इस प्रक्रिया में अफग़ान शिया राजनेताओं के वारे-न्यारे हुए। उनके दर्जनों रेडियो-टीवी चैनल खुल गये।

अमेरिकंस सबसे बड़े मीडिया इंवेस्टर थे। अमेरिकी विदेश मंत्रालय का ‘पब्लिक डिप्लोमेसी डिपार्टमेंट’ ऐसा सक्रिय हुआ कि बड़ी-बड़ी मीडिया कंपनियां फंड के वास्ते ‘यूएसएड’ का अनुषंगी ‘ऑफिस ऑफ ट्रांजिशलन इंनीशिएटिव्स’ (ओटीआई) के दरवाजे खटखटाने लगीं। टोलो न्यूज़ और अरमान रेडियो चलाने वाली कंपनी ‘मोबी कैपिटल’ को नये उद्यम के वास्ते प्रारंभिक धन (सीड मनी) यहीं से प्राप्त हुआ था। केवल मोबी कैपिटल नहीं, कम से कम सौ मीडिया कंपनियों को खड़ा करने में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कम से डेढ़ अरब डॉलर दो दशकों में बहा दिये होंगे।

पश्तो भाषी ट्राइबल एरिया में वॉयस ऑफ अमेरिका ने ‘दीवा’ नाम से प्रतिदिन नौ घंटे की विशेष रेडियो प्रसारण सेवा प्रारंभ की थी। इस इलाके में छह घंटे का एक और प्रसारण था, ‘मशाल’। एक पश्तो टीवी चैनल है शमशाद, यहां भी अमेरिकी पैसे से हरियाली आई। दक्षिणी अफग़ानिस्तान के हेलमंड में शक्तिशाली ट्रांसमीटर लगाये गये। तोरख़म, स्पिन बोल्दाक में भी ऐसे ही सेटअप तैयार किये गये ताकि सीमा पार पाकिस्तान में लोग टीवी देख सकें। अमेरिका ने एक कंपनी को मीडिया इनीशिएटिव का ठेका एक साल के वास्ते दिया। उस ठेके की राशि थी 22 मिलियन डॉलर। 2019 के आखि़र में 203 टीवी कंपनियां अफग़ानिस्तान में रजिस्टर्ड थीं। इनमें से 96 टीवी स्टेशन केवल काबुल में थे, शेष प्रसारण 107 प्रांतीय टीवी केंद्रों से हो रहे थे। 175 से अधिक एफएम रेडियो स्टेशन हैं इस देश में। धन के मामले में कंगाल तालिबान शासन इन कंपनियों को बिना फंड दिये अपने हक में कर पायेगा? जो सबकी आवाज़ बनते थे, उन पत्रकारों पर हो रहे सितम की आवाज़ कौन उठाएगा, यह सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है!

लेखक ईयू-एशिया न्यूज़ के नयी दिल्ली संपादक हैं।

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