अमेरिकी वापसी के बाद अफगान चुनौतियां

अमेरिकी वापसी के बाद अफगान चुनौतियां

जी. पार्थसारथी

 जी. पार्थसारथी

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने बुधवार, 14 फरवरी को घोषणा की थी कि इस साल 11 सितम्बर से पहले सभी अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से हटा लिए जाएंगे। ऐसा होने पर अमेरिकी इतिहास की सबसे लंबी लड़ाई का पटाक्षेप हो जाएगा, जिसकी जड़ में दो दशक पहले हुआ आतंकी हमला था। अफगानिस्तान में तालिबान राज के समय आतंकवादी संगठन अल-कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन द्वारा बनाई सुनियोजित योजना के तहत 11 सितंबर, 2001 के दिन कई अमेरिकी शहरों पर एक साथ कई आतंकी हमले किए गए थे। इनमें 2977 अमेरिकी नागरिक मारे गए थे। इन हमलों के प्रतिकर्म ने अमेरिका द्वारा चलाए गए सबसे लंबे सैन्य अभियान को जन्म दिया था। बाद में एबटाबाद छावनी क्षेत्र से सटी बस्ती में छिपे लादेन को अमेरिकी कंमाडो दस्ते ने मार गिराया था। बिन लादेन पाकिस्तान की सबसे नामी मिलिट्री अकादमी से चंद फर्लांग की दूरी पर बने घर में रह रहा था। पूरे समय अमेरिकी कूटनीति इतनी दिग्भ्रमित और बेजान रही कि तालिबान और अल-कायदा की मदद करने के तमाम सबूतों के बावजूद पाकिस्तान को लताड़ने और प्रतिबंध लगाने की बजाय एक के बाद एक आए अमेरिकी राष्ट्रपति पाकिस्तानी सेना के आगे गिड़गिड़ाते नजर आए।

एक हालिया अमेरिकी अध्ययन से पता चलता है कि अफगानिस्तान में चली लड़ाई से अमेरिकी खजाने पर चकरा देने वाला 22.6 खरब डॉलर का बोझ पड़ा है। इस दौरान लगभग 2,41,000 जानें गई हैं। इस खित्ते में चहुंओर व्याप्त पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अफगान युद्ध के दौरान तालिबान और अफगानिस्तान में छिपे भारत विरोधी आतंकी गुटों के बीच निकट रिश्ते बनवाए रखे। इन संगठनों में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा का नाम शामिल है। जाहिर है आगे भी यह संबंध बने रहेंगे। क्यों न हो, वह तालिबान ही थे, जिन्होंने इंडियन एयरलाइंस की उड़ान आईसी-814 के अपहरणकर्ताओं को नायक की तरह लिया था, जब भारत को यात्रियों को छुड़वाने की एवज में मौलाना मसूद अज़हर, उमर सईद शेख और मुश्ताक ज़रगर जैसे आतंकवादी सौंपने पड़े थे।

अफगानिस्तान में किसी एक पंथ-विशेष का पूरे मुल्क पर जोर नहीं है। बल्कि वहां 14 विभिन्न जातीय एवं भाषाई घटक हैं, इसमें पश्तून, ताजिक, किर्गिज़, बलोच, तुर्कमान और उजबेक मुख्य हैं। पश्तून, जो कुल आबादी का 40.9 फीसदी हैं, ज्यादातर दक्षिण अफगानिस्तान में फैले हुए हैं। कुल जनसंख्या का 37 से 39 प्रतिशत ताजिक हैं, वे अधिकतर उत्तरी अफगानिस्तान में रहते हैं, जिसकी सीमाएं मध्य एशियाई देशों से लगती हैं। ब्रितानी राज में मनमर्जी से उलीकी गई ड्यूरंड लाइन नामक अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा को अफगान पश्तूनों ने कभी मान्यता नहीं दी। उनका मानना है कि अफगानिस्तान की वास्तविक सीमा रेखा पाकिस्तान के अट्टक इलाके में बहती सिंधु नदी के तट तक है। आज पूछा जाने वाला सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अफगानिस्तान को लेकर चीन, अमेरिका, रूस, यूरोपियन यूनियन, पाकिस्तान के बीच प्रतिद्वंद्विता भरी होड़ क्यों लगी हुई है।

इन बाहरी ताकतों द्वारा खास दिलचस्पी दिखाने के पीछे मुख्य कारण यह है कि दुर्लभ खनिज पदार्थों के लिहाज से अफगानिस्तान सोने की खान है। यहां पाए जाने वाले उच्च कोटि के पन्ने, पुखराज, माणिक, फिरोज़ा, लाजवर्त जैसे मूल्यवान रत्नों के प्रति देश-विदेश में दीवानगी है। अमेरिका के संयुक्त राज्य भूगर्भ सर्वेक्षण के अध्ययन अनुसार अफगानिस्तान में लगभग 6 करोड़ मीट्रिक टन तांबा, 2.2 खरब टन लौह अयस्क, 140 लाख टन दुर्लभ भू-पदार्थ जैसे कि लैंथानम, सीरियम, नियोडाइमियम के अलावा एल्यूमीनियम, सोना, चांदी, जिंक, पारा और लिथियम आदि के भंडार मौजूद हैं। अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी के बाद विभिन्न देशों के बीच वहां मौजूद प्राकृतिक स्रोतों को लेकर होड़ मचना तय है, इनमें चीन सबसे सक्रिय प्रतिभागी है।

भारत में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने हेतु अफगान धरा का इस्तेमाल करते हुए ‘सामरिक-गहनता’ का केंद्र बिंदु बनाने के प्रति पाकिस्तान की आसक्ति रही है। यहां पाकिस्तानी सेना का ‘सामरिक-गहनता’ से क्या तात्पर्य है? 9/11 के हमले के उपरांत अमेरिकी दखल से पहले, तालिबान के राज वाले अफगानिस्तान में ‘सामरिक गहनता’ का मतलब था जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी गुटों के लिए प्रशिक्षण कैम्पों और अड्डों की उपलब्धतता बनाना। लेकिन 9/11 की घटना के बाद अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की आमद के बाद वाले दिनों में तालिबान ने पाकिस्तान स्थित भारत विरोधी आतंकी गुटों को हेरात और काबुल में भारतीय दूतावासों पर हमला करने के लिए मदद मुहैया करवाई थी। काबुल में भारतीय दूतावास पर तालिबान और इसके पाकिस्तानी सहयोगियों द्वारा हमला किए जाने की आशंका सदा बनी रहती है। अफगानिस्तान में निर्माणाधीन विकास परियोजनाओं में लगे भारतीय इंजीनियर और व्यावसायिक अमले पर भी इसी तरह का खतरा मंडराता रहता है।

साफ है कि तालिबान अफगानिस्तान के अधिकाधिक भू-भाग पर अपना नियंत्रण बनाना चाहेगा। आईएसआई के चेले तालिबान और अन्य चट्टे-बट्टे जैसे कि हक्कानी नेटवर्क दक्षिणी एवं पूर्वी अफगानिस्तान के ज्यादातर हिस्से को अपने कब्जे में लेने को तैयार बैठे हैं। भारत को सावधानीपूर्वक विश्लेषण करना होगा कि अफगान सशस्त्र सेना को सुदृढ़ करने हेतु अन्य देशों के साथ मिलकर हवाई मारक क्षमता बनाए रखने सहित हथियार-उपकरण देने की व्यवहार्यता और जरूरत पूरी करनी होगी।

अमेरिकी दखल से पहले अफगान युद्ध में भारत की भागीदारी ईरान और ताजिकिस्तान के साथ अपने निकट संबंधों की बदौलत, उनकी भूमि से होकर, नॉर्दन एलायंस नामक अफगान विद्रोहियों को सैन्य एवं सामग्री पहुंचाने के रूप में थी। उस वक्त ताजिक युद्ध-नायक अहमद शाह मसूद उक्त गठबंधन का नेतृत्व कर रहे थे। ईरान का तालिबान के साथ विचारधारा, जातीय और वर्गीय मतांतर रहा है। ईरान से उम्मीद है कि जब तालिबान उसकी अपनी सीमाओं या फिर मध्य एशियाई देश जैसे कि उजबेकिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के साथ लगते गैर-पश्तून या शिया-बहुल इलाकों को कब्जाने को अग्रसर होगा तो वह दखल देगा।

ठीक इसी समय, रूसी, जो अमेरिकी दखल से पहले वाले समय में तालिबान के विरुद्ध नॉर्दन एलांयस की मदद कर रहे थे, अब वे भी उसी तालिबान की मदद करने की खातिर अलग सुर अलाप रहे हैं। देखना यह है कि जब तालिबान रूस के पूर्ववर्ती मध्य एशियाई सोवियत संघ घटक देशों की सीमाओं तक आ पहुंचेंगे, तब रूसियों की प्रतिक्रिया क्या होगी। भारत को न केवल अफगान सरकार बल्कि मुख्य क्षेत्रीय मुखियाओं के साथ यह विचार-विमर्श करना चाहिए कि आने वाले महीनों में क्या किया जाए। अफगान शांति प्रक्रिया में अफगान सरकार और तालिबान को बराबरी का रुतबा दिया गया है। जबकि केवल पश्तूनों के एक भाग का समर्थन प्राप्त तालिबान के साथ राजनीतिक रूप से कैसे बरतना है, इस ओर कम ही सोच-विचार किया गया है।

अमेरिकी नीतियों के आलोक में किसी को यह पक्का नहीं है कि भविष्य में भी अमेरिका अफगानिस्तान को सहायता, खासकर वायु शक्ति की मदद जारी रखेगा। ऐसे में भारत को अफगान राजनीतिक नेतृत्व के बड़े तबके के साथ संपर्क बनाए रखना होगा। तथापि तालिबान के कुछ धड़ों के साथ भी संपर्क बनाना व्यावहारिक दृष्टि से सही रहेगा। दीर्घकाल में पाकिस्तान को भी अफगानिस्तान की सरकार से इलाकाई और अन्य दावों का सामना पड़ेगा, जो पश्तूनों की संवेदनशील आकांक्षा से जुड़े हैं।

लेखक पूर्व राजनयिक हैं।

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