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सहज जीवन से ही सुकून-शांति की प्राप्ति

अंतर्मन

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सरलता का जीवन, वह धरा है, जहां संवेदनाओं की फसल निरंतर लहलहाती रहती है। सही मायनों में सहजता ही वह उर्वर शक्ति है, जो हमारे व्यक्तित्व को ‘बंजर’ होने से बचाने में सक्षम है।

यह समय की विसंगति ही कही जाएगी कि आर्थिक तरक्की और समृद्धि के बावजूद हमारे व्यवहार में कृत्रिमता का गहरा दखल हो गया है। किसी नजदीकी व्यक्ति से बातचीत करते हुए दिमाग में जोर डालना पड़ता है कि इस व्यक्ति की बात का वास्तविक अर्थ क्या है। यह भी कि अपने हितों की पूर्ति के लिए उसके व्यवहार में बदलाव क्यों व कैसे आ जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो हम देश-काल-परिस्थिति और अपनी जरूरतों के मुताबिक व्यवहार बदलते रहते हैं। व्यक्तित्व की जटिलता को विशिष्टता मानने का भ्रम मानवीय व्यवहार की विसंगति बनती जा रही है, जिसके लिये हम तमाम तरह के आडंबर व प्रपंच करते नजर आते हैं। हम आध्यात्मिक व धार्मिक होने का प्रदर्शन तो करते हैं लेकिन सही मायनों में हमारे कार्य व्यवहार में वो नजर नहीं आता है। आखिर व्यक्ति को अपने सामाजिक दायरे में ये गिरगिटी रंग क्यों बदलने पड़ते हैं? आखिर व्यक्ति क्यों स्वाभाविक जीवन नहीं जी पाता?

समय की विडंबना है कि सच बोलने से पहले व्यक्ति दस बार उसके नफे-नुकसान का आकलन करता है। यहां तक कि आत्मीय संबंधों में भी ‘सहज संवाद’ के बजाय व्यक्ति नफे-नुकसान का गणित देखता रहता है। सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में हानि-लाभ का गणित तलाशना हमारी आदत बन जाती है। ऐसा लगता है, जैसे जीवन सामाजिक व्यवहार के बजाय मुनाफे की दुकान बनकर रह गई हो। हम भूल जाते हैं कि सामाजिक व्यवहार कोई गणित का सवाल नहीं है, जिसे नफे-नुकसान के तराजू में तौला जा सके। दिखावे की इस दुनिया और आडंबरपूर्ण जीवन के बीच, कवि पं. भवानी प्रसाद मिश्र हमें चेताते हुए कहते हैं—

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‘तुम बंजर हो जाओगे/ यदि इतने व्यवस्थित ढंग से रहोगे/ यदि इतने सोच समझकर बोलोगे/ चलोगे/ कभी मन की नहीं कहोगे/ सच को दबाकर झूठे प्रेम के गाने गाओगे/ तो मैं तुम से कहता हूं,/ तुम बंजर हो जाओगे!’

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सही मायनों में यहां बंजर होने से कवि का तात्पर्य मनुष्य द्वारा अपनी ‘सहजता’ को खो देना है। यह उस आंतरिक शून्यता की ओर उन्मुख होने का संकेत है, जहां मनुष्य के भीतर से प्रेम, करुणा और संवेदनाओं का स्रोत सूख जाता है। कवि की ये पंक्तियां नफे-नुकसान के सम्मोहन को त्यागने की बात करती है।

कवि जिस बंजरपन से बचने की बात करता है, उसका समाधान केवल और केवल ‘जीवन की सहजता’ में निहित है। प्रश्न उठता है कि यह जीवन की सहजता आख़िर है क्या? क्या यह सरल होना मात्र है या कुछ और? दरअसल, सहजता का अर्थ है, मनुष्य का मूल व्यवहार। वह जो मनुष्य मूल प्रकृति है, जो हमारी कृत्रिमता, प्रदर्शन की इच्छा या ‘लोग क्या कहेंगे’ के भय से मुक्त है। सहज व्यक्तित्व में कोई जटिलता नहीं होती और अंदर कोई दोहरा व्यक्तित्व भी नहीं पलता। सहज व्यक्ति अपनी कमियों और खूबियों के साथ को स्वीकार करता है। हां, सहजता का अर्थ प्रमाद, अनुशासनहीनता या अनियंत्रित होना बिल्कुल नहीं है।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार अपने मूल स्वभाव को छोड़कर किसी दूसरे के छद्म व्यवहार का अनुसरण सर्वथा त्याज्य है। यहां ‘स्वधर्म’ का अभिप्राय किसी कर्मकांड से नहीं, अपितु हमारी उस ‘मौलिक प्रकृति’ से है, जिसके साथ हमारा अस्तित्व स्पंदित होता है। यदि मनुष्य अपनी मौलिकता के व्यवहार में जीवन जीता है तो वह स्वस्थ जीवन भी जी सकता है।

निर्विवाद रूप से हमारे जीवन का वास्तविक सौन्दर्य सहजता में ही निहित है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर हम सहज क्यों नहीं रह पाते? दरअसल, इस असहजता की जड़ें हमारे उस मनोविज्ञान में निहित हैं, जहां हम स्वयं की एक आदर्श छवि गढ़ने की कोशिश में रहते हैं। हम स्वयं को अत्याधिक बुद्धिमान, संस्कारवान या फिर सफल दिखाने के सम्मोहन में बंध जाते हैं। फिर इसी गढ़ी हुई छवि को बनाए रखने का निरंतर दबाव हमें भीतर ही भीतर कमजोर बना देता है। हमें निरंतर यह भय सताने लगता है कि यदि हम अपने मौलिक स्वरूप में दिखे तो समाज हमें कमजोर या सामान्य न समझ ले ।

दरअसल, सहजता के मार्ग में दूसरी बड़ी चुनौती व्यक्तित्वों की ‘तुलना’ है। सही मायनों में हम दूसरों से स्वयं की तुलना करके हम अपने जीवन की स्वाभाविक लय को खो देते हैं। इसके अतिरिक्त कई बार माता-पिता द्वारा बच्चों की दोषपूर्ण परवरिश भी उसकी मौलिक प्रकृति को प्रभावित करती है, जो उसक सहज जीवन जीने में बाधा उत्पन्न करती है।

सहजता की ओर लौटने में ‘स्वयं की स्वीकार्यता’ ही सबसे महत्वपूर्ण सोपान है। हमें स्वयं को उसी रूप में स्वीकार करना चाहिए जैसे हम वास्तव में हैं। जब हम अपनी वास्तविकता को स्वीकार कर लेते हैं तो हम दूसरों के सामने बेझिझक अपनी मौलिकता और सहजता के साथ खड़े नजर आ सकते हैं। दूसरे, सहज रहने के लिए यह भी अनिवार्य है कि हमारी कथनी और करनी में कोई अंतर न हो। हमारे शास्त्र भी कहते हैं—‘यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रिया’। अर्थात‍् जैसा हमारा चित्त हो, वैसी ही हमारी वाणी हो और जैसी हमारी वाणी हो, वैसा ही हमारा आचरण हो।

प्रकृति का एक शाश्वत नियम है—‘जो वास्तविक है, वही सुंदर है।’ इसलिए स्वयं को दिखावे से मुक्त रखें। अपनी एक कृत्रिम छवि गढ़ने के लिए अपनी ऊर्जा को व्यर्थ न गवांयें । सहज जीवन वह भूमि है जहां संवेदनाओं की हरियाली सदैव लहलहाती रहती है। वास्तव में, सहजता ही वह उर्वर शक्ति है जो हमारे व्यक्तित्व को ‘बंजर’ होने से बचाती है।

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