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पारिस्थितिकी को नुकसान की जवाबदेही तय हो

फूलों की घाटी में आग

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फूलों की घाटी में लगी आग में वन संपदा के अलावा बड़ी संख्या में औषधीय पौधे, पक्षी, वनस्पति, वन्य-जीवों के आवास, पारिस्थितिकीय तंत्र स्वाह हुआ है। इसमें किसी स्तर पर निगरानी व प्रबंधन तंत्र की खामी तो है ही।

नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान के बफर जोन के अंतर्गत आने वाली फूलों की घाटी देश-दुनिया में मशहूर है। उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहर है। धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला यह बायोस्फीयर रिजर्व, हिम तेंदुआ और हिमालयी भालू और ब्रह्मकमल आदि जैसी असंख्य दुर्लभ प्रजातियों के लिए विख्यात है। हर साल हजारों पर्यटक कुदरत की खूबसूरती देखने यहां आते हैं। लेकिन यह बेहद संवेदनशील जगह बीती नौ जनवरी से लगी आग से लगातार धधक रही है।

फूलों की घाटी में सबसे पहले पेनावडी और भ्यूंडार रेंज की पहाड़ियों पर आग लगी थी। समस्या यह है कि अलकनंदा और लक्ष्मण गंगा नदियों के बीच स्थित ऊंची चट्टानों, पेड़-पत्थर गिरने और जलते पेड़ों के चलते यहां राहत व वनकर्मियों का आग बुझाने के लिए पहुंचना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है। यहां न सड़क है और न पैदल रास्ता। एसडीआरएफपी भी मौके पर नहीं पहुंच पा रही। वहीं अत्याधुनिक उपकरणों व संसाधनों का अभाव है। सूखी झाड़ियां,पत्तियां, सूखे पेड़ भी आग को फैला रहे हैं। जंगलों में धुंए का गुब्बार और लपटें दिखाई देती हैं। आग नंदा देवी पार्क के नीचे के इलाके में हरे पेड़ों तक पहुंच गयी है। जबकि प्रशासन का दावा है कि फूलों की घाटी क्षेत्र के गोविंद गढ़ रेंज में, बद्रीनाथ की निजमुला घाटी व गौणा गांव के जंगलों में लगी आग पर आंशिक रूप में काबू पाया है। लेकिन अभी 15 हैक्टेयर से ज्यादा इलाका धधक रहा है।

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हकीकत यह है कि नीचे की ओर लगी आग बुझाने में तो वनकर्मी जुटे हुए हैं लेकिन दुर्गम इलाके में खड़ी चट्टानों पर लगी आग पर काबू पाने में प्रशासन खुद को असमर्थ पा रहा है। चिंताजनक यह भी कि फायर सीजन से पहले ही यानी सर्दियों के मौसम में उत्तराखंड के जंगल धधक रहे हैं। जबकि अभी न बारिश है और न ही बर्फबारी हुई। ऐसे में अप्रैल- मई में जब तापमान 35-40 से ऊपर पहुंचेगा, तब क्या होगा? इन हालात से उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं दोनों अंचल अछूते नहीं। उत्तरकाशी में वरणावत के पहाड़ी क्षेत्र, दशोली के निजमुला घाटी, पेनखंडा, पौड़ी के जामणाखाल, लाता, मैंग्यूल और कुमाऊं के अल्मोड़ा में हवालवडा,नहला और पाटलीबगड के जंगल कई दिनों से धधक रहे हैं, उनपर भी अंकुश नहीं लग सका है। हवा के साथ आग और फैल रही है। जबकि मौसम विभाग की मानें तो अगले 10 दिनों तक बारिश की कोई संभावना नहीं।

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वह बात दीगर है कि राहत कार्य में मदद के लिए वायु सेना के एमआई 16 हेलीकॉप्टर बांबी बकेट आपरेशन के लिए जोशीमठ में तैनात हैं। लेकिन उनका उपयोग प्रशासन हवाई सर्वे और आग की तीव्रता व भयावहता के आकलन के अलावा आपदा प्रबंधन के बीच समन्वय के बाद ही कर सकेगा। वायु सेना और वन विभाग बांबी बकेट आपरेशन के मुद्दे पर सोशल मीडिया में वायरल एक वीडियो के मामले में बहस में उलझे हुए हैं। वायु सेना आग बुझाने में टिहरी-श्रीनगर डैम से पानी लाने में दिक्कत, पानी के स्रोत पास में नहीं होने और लॉजिस्टिक्स में मुश्किलों की बात कर रही है।

विचारणीय यह है कि वन विभाग केवल इतना कह रहा है कि जंगल की आग में सूखे पेड़ों के गिरने की वजह से बढ़ोतरी हुई है। वह यह बताने में नाकाम है कि आग कैसे लगी,किसने लगायी,असामाजिक तत्वों का तो इसमें हाथ नहीं है या फिर शार्टसर्किट से लगी या फिर चरवाहों ने लगायी। दरअसल जंगल की आग में बढ़ोतरी में लापरवाही की अहम भूमिका है। यदि वह समय रहते विभाग सक्रिय हुआ होता तो इतना नुकसान नहीं होता।

गौरतलब है कि इस आग में करोड़ों की लकड़ी ही नहीं जली है, लाखों औषधीय पेड़-पौधे, पक्षी, वनस्पति, वन्य-जीवों के आवास, पारिस्थितिकीय तंत्र स्वाह हुआ है। डीएफओ चेतना कांडपाल भी इसे स्वीकारती हैं। सवाल है कि इस आग के लिए कौन जिम्मेदार है। क्या हर साल की तरह इस आग का मुद्दा भी फाइलों में दफन हो जायेगा। पहाड़ों पर आग लगने की घटनाएं तो हर साल होती हैं। क्या हमने उनसे कोई सबक सीखा है? पर्यावरण संरक्षण की बात करने वाली सरकारें हकीकत में पर्यावरण संरक्षण के प्रति गंभीर होनी चाहिए।

इस लापरवाही के लिए जवाबदेह तंत्र यह क्यों नहीं सोचता कि पहाड़ नहीं रहेंगे, वन संपदा इसी तरह आग की समिधा बनती रहेगी, तो ग्लेशियर खत्म हो जायेंगे, उस दशा में नदियां व अन्य जलस्रोत सूख जायेंगे और हम पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसेंगे। तब क्या होगा? इस बारे में आमजन को भी सोचना होगा कि पहाड़ रहेंगे, वनस्पति रहेगी, हरियाली रहेगी तो पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तो हमारा जीवन सुरक्षित रहेगा। जिस तरह जलवायु परिवर्तन हमें चेतावनी दे रहा है, उसे देखते हुए हमें भी सावधानी बरतनी होगी। देवभूमि उत्तराखंड के जंगल बचाने की जिम्मेवारी हम सबकी है। अरावली प्रकरण एक चेतावनी है कि अब भी समय है, संभल जाओ।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् हैं।

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