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न्याय की सुलभता हो कानूनी शिक्षा का मकसद

गुणवत्ता-सार्थकता जरूरी

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देश में कानूनी शिक्षा का स्वरूप ‘न्याय की सुलभता’ पर केंद्रित होना चाहिए। वकीलों को ग्रामीण और जिला स्तर की अदालतों के लिए भी तैयार करना जरूरी है। विश्वविद्यालयों में ऐसे ‘न्याय के प्रहरी’ तैयार किये जाएं जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हों तथा असल सामाजिक समस्याओं से भी गहरे जुड़े हों।

भारत में कानूनी शिक्षा को केवल एक स्नातक डिग्री हासिल करने के माध्यम के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह एक जीवंत प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य ऐसे सजग ‘सोशल इंजीनियर’ तैयार करना है जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को न्याय दिला सकें। हाल ही में अश्विनी उपाध्याय बनाम भारत संघ (2026) मामले में उच्चतम न्यायालय की जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की। स्पष्ट किया कि कानूनी शिक्षा जैसे नीतिगत मामलों में जल्दबाजी में निर्णय नहीं लिया जाएगा।

यह वक्तव्य संकेत करता है कि वर्तमान में जारी 4 साल बनाम 5 साल की अवधि का विवाद केवल समय की गणना का नहीं, बल्कि ‘गुणवत्ता, सार्थकता और परिपक्वता’ का है। कानून कोई यांत्रिक या तकनीकी विषय नहीं जिसे सिर्फ सूत्रों से समझा जा सके; यह समाज, संस्कृति व नैतिकता के ताने-बाने से बुना हुआ है। सफल ‘विधिवेत्ता’ बनने के लिए छात्र को वे सामाजिक मूल्य आत्मसात करने हेतु पर्याप्त ‘मानसिक स्पेस’ व समय चाहिये।

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भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण देश में कानूनी शिक्षा का स्वरूप अनिवार्य रूप से 'न्याय की सुलभता' पर केंद्रित होना चाहिए। वर्तमान शिक्षा प्रणाली का बड़ा दोष है कि यह मुख्यतया कॉर्पोरेट घरानों व उच्च न्यायालयों के लिए वकील तैयार करती है। हमें यह ढांचा बदलने की जरूरत है ताकि वकीलों को ग्रामीण और जिला स्तर की अदालतों के लिए भी समान रूप से तैयार किया जा सके। इसके लिए ‘लोक अदालत’ और ‘मध्यस्थता’ जैसे वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्रों को पाठ्यक्रम का अनिवार्य और व्यावहारिक हिस्सा बनाना होगा। क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों की भूमिका यहां और भी अहम हो जाती है। उन्हें स्थानीय विधिक समस्याओं, जैसे ग्रामीण भूमि विवाद, पारिवारिक उत्तराधिकार और सामुदायिक न्याय प्रणालियों पर ‘क्लीनिकल रिसर्च’ को बढ़ावा देना चाहिए। जब तक कानून का छात्र जमीन से नहीं जुड़ेगा, न्याय की वास्तविक अवधारणा को नहीं समझ पाएगा।

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वैश्विक परिदृश्य में देखें तो कानूनी शिक्षा का ढांचा इस बुनियादी प्रश्न पर टिका है कि इसे ‘सामान्य स्नातक’ माना जाए या ‘विशेषज्ञता वाला पेशा’। भारत में 5-वर्षीय एकीकृत पाठ्यक्रम सबसे लोकप्रिय है, जो छात्र को शुरू से ही कानूनी परिवेश में ढाल देता है। इसके उलट, अमेरिका में कानून ‘पोस्ट-ग्रैजुएट’ शोध विषय है। पश्चिमी देशों में कानून ‘अकादमिक अनुसंधान’ का विषय है, जबकि भारत में इसे ‘व्यावसायिक कौशल’ तक सीमित कर देते हैं। विकसित देशों के संस्थान ‘विधिक तर्कशीलता’ के साथ ही 'विषयांतर अनुशासनात्मक' शिक्षा पर बल दे रहे हैं। हमें भी अब कानून को डेटा साइंस, अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान के साथ जोड़कर पढ़ाना होगा। अंतरिक्ष कानून, ऊर्जा कानून और खेल कानून जैसे उभरते क्षेत्रों को अपनाना वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिकने को अनिवार्य है।

मौजूदा दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने विधिक शोध और दस्तावेज लेखन बेहद सरल बना दिया। कानून से जुड़े बुनियादी कार्य मशीनों द्वारा किए जाने की प्रबल संभावना है। चुनौती ‘मानवीय विवेक बनाम मशीन’ की है। अधिवक्ताओं को ‘मशीनी निर्भरता’ पर नियंत्रण रखना सीखना होगा। मशीनी एल्गोरिदम जानकारी तो दे सकते हैं, लेकिन उस ‘मानवीय अंतर्दृष्टि’ और ‘व्यावसायिक नैतिकता’ का स्थान नहीं ले सकते जो एक जटिल मामले में न्यायपूर्ण निर्णय के लिए जरूरी होती है। इसलिए, पाठ्यक्रम में ‘विधिक तकनीक’, ‘डिजिटल नैतिकता’ और ‘साइबर सुरक्षा कानून’ को अनिवार्य शामिल करना चाहिए। सफल अधिवक्ता वही होगा जो तकनीक को ‘गुलाम’ की तरह उपयोग करे, न कि उसका गुलाम बन जाए। ‘लीगल डिजाइन थिंकिंग’ का उपयोग कर कानून की जटिलताओं को सरल बनाकर आम आदमी के लिए सुलभ बना सकते हैं।

भारतीय कानूनी जगत की विडंबना है कि न्याय की भाषा आज भी मुख्यत: अंग्रेजी है, जबकि बहुसंख्यक आबादी इस भाषा से अपरिचित है। ‘बहुभाषी शिक्षा’ और ‘कानूनी अनुवाद’ को बढ़ावा देना समय की मांग है। वास्तविक विधिक क्रांति तब आएगी जब एक वकील अपनी स्थानीय भाषा में जटिल कानूनों को समझा सके और न्यायालय में पैरवी कर सके। शिक्षा का माध्यम ऐसा हो जो भाषाई बाधाओं को तोड़ कानून की समझ को सर्वव्यापी बनाए। जब तक कानून की पढ़ाई बोझिल और औपनिवेशिक शब्दावली से मुक्त नहीं होगी, तब तक यह समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए ‘अनसुलझी पहेली’ रहेगी।

जैसे मेडिकल छात्र के लिए अस्पताल में बिताया गया समय उसके कैरियर की नींव होता है, वैसे ही लॉ छात्रों के लिए ‘लीगल एड क्लीनिक्स’ और ‘मूट कोर्ट्स’ वास्तविक पाठशालाएं हों। छात्रों को वास्तविक मुकदमों, क्लाइंट काउंसलिंग और कानूनी ड्राफ्टिंग का व्यावहारिक अनुभव मिले। पाठ्यक्रम में छात्रों के ‘मानसिक स्वास्थ्य’ और ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ पर भी ध्यान दिया जाए। ‘एल्गोरिदम की समझ’ और ‘ऑनलाइन विवाद समाधान’ के इस युग में सफलता का मंत्र अब केवल ‘किताबी ज्ञान’ नहीं, बल्कि ‘तकनीकी निपुणता’ और ‘व्यावहारिक कौशल’ का मेल है।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम बोनी फोई लॉ कॉलेज (2023) के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिक्षा मानकों में सुधार न्यायिक ढांचे के लिए अपरिहार्य है। विश्वविद्यालयों को अब ‘वकीलों की फौज’ पैदा करने वाली फैक्टरी बनने से रुकना होगा। हमें ऐसे ‘नीति निर्माता’ और ‘न्याय के प्रहरी’ तैयार करने हैं जो न केवल वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हों, बल्कि अपनी मिट्टी और सामाजिक समस्याओं से भी गहरे जुड़े हों।

लेखक कुरुक्षेत्र विवि के विधि विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं।

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