अब नेताओं के एआई से बनने वाले वीडियोज़ आने लग गए हैं। लेकिन अब फिर विवाद वहीं है-विज्ञान वरदान है या अभिशाप वाला।
एक जमाना था साहब, जब विज्ञान वरदान है या अभिशाप, छात्रों के निबंध, निबंध प्रतियोगिताओं का और वाद-विवाद प्रतियोगियों का भी विषय हुआ करता था। अब एआई का रुतबा विज्ञान तथा तकनीक के क्षेत्र में तो बेशक बहुत ऊंचा है, लेकिन इधर राजनीति के क्षेत्र में भी उसने अपना जबर्दस्त रुतबा कायम कर लिया है। जब से विज्ञान ने राजनीति में कदम रखा और नेताओं की सीडियां बनने लगीं, तभी से वह विज्ञान के वरदान या अभिशाप वाले विषय की तरह ही चर्चित रहा है। चर्चित जनाब सिर्फ नेता ही नहीं होता, उसके बयान ही नहीं होते, उसका दलबदल ही नहीं होता, उसकी इमेज ही नहीं होती चर्चित, उसकी सीडियां भी हो जाती हैं। इतनी कि अगर वे उसके लिए अभिशाप साबित होती हैं, तो उसके विरोधियों के लिए वरदान साबित होती हैं।
पहले जहां अपने विरोधी नेता को पटखनी देने के लिए तरह-तरह के सबूत जुटाने पड़ते थे, गवाह जुटाने पड़ते थे, अखबारों की कतरनें जुटानी पड़ती थीं, वहां अब विज्ञान के वरदान होने की तरह सीडियां और खासतौर से उस तरह वाली सीडियां वरदान बनने लगीं। सीडियों वाले नेता कहते कि उस सीडी में वह है ही नहीं। लेकिन वह सीडी उससे घोटाले की तरह चिपक जाती और लाख छुड़ाने पर भी नहीं छूटती।
फिर विज्ञान ने और तरक्की की और सीडियां गुजरे जमाने की बात हो गयीं और उनकी जगह वीडियोज ने और खासतौर से कांट-छांट वाले वीडियोज ने ली। कांट-छांट वाले यह वीडियो एक तो सीडियों के मुकाबले ज्यादा विश्वसनीय साबित हुए और दूसरे वे किसी को डब्बू और किसी को पप्पू बनाने के बड़े काम आए। किसी के लिए वरदान और किसी के लिए अभिशाप साबित होने की तरह उन्होंने किसी की इमेज बनायी और किसी की बिगाड़ी। बताते हैं कि इन्होंने फेक न्यूज को भी खूब पाला-पोसा। बल्कि कुछ लोगों का तो यह मानना है कि इन वीडियोज के बिना फेक न्यूज बेवा की तरह ही होती। जिनकी इमेज बनती रही उन्होंने कभी गिला नहीं किया, करते भी क्यों? मीठा-मीठा सब गप होता है न।
लेकिन जिनकी इमेज बिगड़ी उनके गिले-शिकवे कभी कम नहीं हुए। कोई कहता वीडियो डॉक्टर्ड है, तो कोई कहता कि काट-छांट करके बनाया गया है। लेकिन जनता ने जैसे सीडियों पर भरोसा किया, वैसे ही इन वीडियोज पर भी भरोसा किया और उन्हें फारवर्ड कर-करके खूब मजे लिए। विज्ञान और तकनीक ने और तरक्की की और अब एआई से बनने वाले वीडियोज आने लग गए हैं। लेकिन अब फिर विवाद वहीं है-विज्ञान वरदान है या अभिशाप वाला। एआई जनरेटेड वीडियोज बनाने के लिए राजनीतिक पार्टियों ने अपने नए विभाग खोल दिए हैं। नहीं क्या?

