भारत-पाक के बीच युद्धों में छम्ब-जौड़ीयां सेक्टर पाकिस्तान के सैन्य योजनाकारों के लिए एक रणनीतिक आसक्ति बना रहा। साल 1971 के युद्ध में भी यहां तैनात भारतीय सेना की 10वीं इन्फैंट्री डिवीजन की दुश्मन की सेना से भीषण भिड़ंत हुई। एक बार तो लगा कि भारतीय फौजी टुकड़ी हर तरह से फंस गयी, लेकिन किस्मत ने साथ दिया।
सत्रह दिसम्बर 1971 की रात, 8 बजे, पश्चिमी मोर्चे पर भारत-पाकिस्तान युद्ध में, पंद्रह दिनों तक लगभग निरंतर चली जानलेवा लड़ाई के बाद, समूचे छम्ब युद्ध क्षेत्र में अचानक गहराया सन्नाटा मुझे ब्रह्मांड में उस सर्वव्यापी अलौकिक शांति की याद दिला गया, जो ईश्वर द्वारा पृथ्वी पर जीवन के सृजन से पहले पसरा होगा। लेकिन, क्या हमने युद्ध खत्म होने की खुशी में नाच-गाना किया?अपनी बात करूं तो, मैं तो बस हैरान था कि यह सब हो क्या रहा है, ठीक वैसे ही जैसे कि कवि रॉबर्ट साउदर्न से ‘ब्लेंहेम की लड़ाई’ के बारे में दो किशोर पोते-पोतियों ने मासूमियत से पूछा था ‘अब हमें युद्ध के बारे में बताओ, और वे एक-दूसरे से क्यों लड़े?...’ और कविता इन पंक्तियों के साथ खत्म होती है... ‘और सबने ड्यूक की तारीफ की जिसने यह महान लड़ाई जीती।’ लेकिन आखिर इसका क्या फायदा हुआ? छोटे पर्किन ने कहा। कवि ने कहा ः ‘क्यों, यह मैं नहीं बता सकता लेकिन यह शानदार जीत थी’।
इतिहास में देखें तो, तीनों भारत-पाकिस्तान युद्धों में भारतीय उपमहाद्वीप का यह छोटा सा हिस्सा पाकिस्तान के सैन्य योजनाकारों के लिए एक सामरिक आसक्ति बना रहा और दक्षिणी पीर पंजाल क्षेत्र पर प्रभुत्व जमाने के लिए युद्ध की शुरुआत का मुहाना एवं जम्मू क्षेत्र के लिए संभावित खतरा रहा अलबत्ता वे इसमें सफल नहीं हुए। इन प्रवृत्तियों के मद्देनज़र,द्वितीय विश्व युद्ध की नामी 10वीं इन्फैंट्री डिवीजन को छम्ब-जौड़ीयां सेक्टर में रक्षा स्थिति मजबूत करने और 1965 के युद्ध में छम्ब सेक्टर में पाकिस्तान द्वारा कब्जाए इलाके को फिर हासिल करने के उद्देश्य से तैनात किया गया था। लेकिन यहां हमारे पाकिस्तानी दुश्मनों ने 3 दिसंबर, 1971 की शाम शुरू हुए साहसिक पूर्व-आक्रमण से हमें मात दे डाली।
उनका मंसूबा तभी साफ हो गया जब विभिन्न कैलिबर की लगभग 180 तोपों ने एक साथ फायरिंग शुरू कर दी, जिससे नारंगी-गुलाबी रोशनी फैल गयी, तोपों की लगातार फायरिंग की गड़गड़ाहट दूर तक सुनाई देती। लेकिन अगले पल, वह ज़बरदस्त आवाज़ हमारे चारों ओर बरसने वाले घातक गोलों के कानफाड़ू धमाकों के सामने फीकी पड़ गई। तारों से भरा आसमान, धुएं और मलबे के गुबार से ढक गया।
पांच दिसंबर की रात तक पाकिस्तान ने तवी नदी के पश्चिम तट का बचाव कर रही 191 इन्फैंट्री ब्रिगेड ग्रुप के ज़्यादातर भाग को लगभग निष्क्रिय कर डाला था, सिवाय 12वीं फील्ड रेजिमेंट (आर्टिलरी) के, और जी-ओ-सी ने 6 दिसंबर को अपने कमांडरों को पीछे हटने को कहा। लग रहा था कि हमारी कमांड रेडियो फ्रीक्वेंसी हैक हो गई क्योंकि उस रात तोपखाने के अनवरत हमलों ने खूनखराबे में और इजाफा कर दिया।
6 दिसंबर को लगभग 5 बजे, 191वीं ब्रिगेड ने 12वीं फील्ड रेजिमेंट द्वारा दिए कवरिंग फायर के तहत पीछे हटना शुरू किया और पौने आठ बजे तक, अलग-थलग पड़ चुकी 12वीं फील्ड की हालत देख, दुश्मन ने तवी तट पर घोड़े की नाल जैसी घेराबंदी बनाकर, हम तोपचियों को उसके तंग होते घेरे में फांसने का मौका हथिया लिया! हम हर तरह से फंस चुके थे, लेकिन किस्मत ने हमारा साथ दिया जैसे कि घेराबंदी तोड़ने की हमारी व्यूहरचना की गाथा को पश्चिमी कमान के जी-ओ-सी लेफ्टि.जन. केपी कैंडथ,ने ब्यान किया :‘इस टुकड़ी (यानी 12वीं फील्ड रेजिमेंट की ‘क्यू’ तोपखाना टुकड़ी) की तोपें मुनावार तवी पुल को पार करने वाली सैनिकों की आखिरी संगठित टुकड़ी थीं, जिन्होंने बड़े जोश से और रणनीतिक ढंग पर अमल करते हुए, कुछ-कुछ दूरी तक पीछे हटते वक्त भी फायरिंग जारी रखी, दुश्मन की पीछा करती इन्फैंट्री के थककर रुकने तक वे प्वांइट ब्लैंक फायरिंग करती रहीं, उपरांत पुल को हमारी रक्षात्मक रणनीति के तहत 101वीं इंजीनियर फील्ड कंपनी द्वारा 6 दिसंबर, 1971 को पौने बारह बजे उड़ा दिया गया’।
भीषण लड़ाई के बीच भी हास्य के पल आते हैं। जब 7 दिसंबर को हमारे खोजी पहरेदारों ने हमारे तोपखाने इलाके में एक संदिग्ध ‘घुसपैठिए’ को पकड़ा। लेकिन 1956 में आईएमए, देहरादून में हमारे आखिरी साथ के बाद, बख्तरबंद कोर की वर्दी में, 6 फीट लंबे उस ‘घुसपैठिए’ मेजर से इस तरह मिलना कितना अजीब रहा! हम दोनों ने तुरंत पहली नज़र में एक-दूजे को पहचान लिया;यह मित्र ग्रोवर पास की एक खाई में सो रहा था जब उसके टैंक सैनिकों ने ‘तुरंत आगे बढ़ो’ के आदेश पर कार्रवाई की, और अपने ट्रूप कमांडर को नींद पूरी करते छोड़ आगे बढ़ गए!
और आखिर में, विरासत बनने काबिल यादें। जब लगने लगा कि हमने बाजी जीत ली, तो दुश्मन ने पूर्वी किनारे पर कई छोटी-छोटी घुसपैठें करके फिर हैरान कर दिया, जिससे खतरे की घंटियां बज उठीं और हमें और पीछे हटने के आदेश मिले। सूबेदार मेजर संत राम साहब ने रूआंसी आंखों से कहाः‘साहब, ऐना पीछे हट-हट के, घर वापस जा के अपना मुंह किवें दिखावांगे’! मैं जवाब ढूंढ ही रहा था, तभी वह आदेश वापस ले लिया गया, संत राम साहब खुशी से बोले ः ‘ऐह तां रब ने फौज दी इज्जत बचा दित्ती, साहब जी’! 14 दिसंबर सुबह पहली बार तोपखाने से स्पोर्ट-फायर की मांगों में कमी आई और दोपहर को, सबकी नज़रें एक संतरी पर पड़ीं जो संगीन की नोक पर दो पगड़ी धारी सिख ग्रामीणों को मेरे पास ला रहा था और अचानक उन्होंने ‘ओह बल्ले-बल्ले’ कहते हुए बांहों में भरकर मुझे ऊपर उठा लिया! हमारा पूरा तोपखाना हैरानी भरी हंसी से चहक उठा।
तभी कुछ संकुचाते हुए हवलदार क्लर्क, निर्मल सिंह रेजिमेंटल कमांड पोस्ट के बंकर से बाहर निकले, ताकि अपने उन मामाओं से मेरा सकें! गुरदासपुर से आगे लिफ्ट लेकर आने और रास्ते में हर मिलिट्री पुलिस जांच चौकी को चकमा देने की कहानी सुनाने के बाद, उन्होंने कहाः ’असीं सोचेआ ऐनी घमासान जंग लग्गी है, ते असां आपणे भांजे नूं ज़रूर मिल आईए’! हमने उन्हें शानदार लंच कराया, रम पंच पैग के साथ, और फिर अखनूर वापस भिजवा दिया।
सूबेदार मेजर संतराम साहब और हवलदार निर्मल सिंह और उनके मामा जैसे लोग प्रतीक हैं उनका, जो भारतीय सशस्त्र बलों से दिल से जुड़े हैं, जैसाकि फिलिप मेसन ने कहा हैः ‘क्योंकि यह इज्जत का मामला है!’ ...न कम, न ज़्यादा।

