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रंगों से मिल-जुल बने एकता का इंद्रधनुष

रंगों का संदेश यही है कि हमारा समाज इंद्रधनुषी रंगों से बना है। जब सात रंग आपस में मिल जाते हैं तो इंद्रधनुष बनकर सामने आता है। एकता और सद्भाव से ही कोई समाज बहुरंगी मोहक आभा बिखेरता है। होली...

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रंगों का संदेश यही है कि हमारा समाज इंद्रधनुषी रंगों से बना है। जब सात रंग आपस में मिल जाते हैं तो इंद्रधनुष बनकर सामने आता है। एकता और सद्भाव से ही कोई समाज बहुरंगी मोहक आभा बिखेरता है। होली का यही मंतव्य है कि हम मनभेद भुलाकर एकता के रंग में रंग जाएं।

होली बदरंग हो रही है। ठीक इंसानियत के विघटन की तर्ज पर। संवेदनाओं के क्षरण की माफिक। फ़ितूरी प्रवृत्ति की ओर झुक रही फ़ितरत की भांति। मानो प्रकृति भी मेरी इस राय की ताकीद कर रही है। चंद्रग्रहण की कालिख से होली फ़िकली करते हुए।

कहने की जरूरत नहीं है कि होली हमारी समृद्ध संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है। यह हमारे ऋतु चक्र व खेती के उल्लास से जुड़ा त्योहार है। जाति व धर्म के नाम पर अलगाव की सोच को त्यागकर समाज में सद्भावना कायम करना त्योहार का मुख्य मकसद रहा है। आज वक्त के साथ हमारे समाज में कटुता व टकराव की सोच बढ़ती दिख रही है। पहले समाज में सद्भावना मजबूत करने की बात की जाती थी, मगर अब सद्भावना पैदा करनी पड़ती है। लोगों में छोटी-छोटी बातों को लेकर वैमनस्यता व कटुता बढ़ी है। हमारी एकता अखंडता के लिए खतरा बढ़ा है। हमारी सामाजिक समरसता पर खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में आज होली जैसे त्योहार का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है, जिसके लिये स्वयंसेवी सामाजिक संगठनों व सरकार की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

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आज यह गलत परंपरा विकसित हो रही है कि लोग किसी भी जयंती व त्योहार के अवसर को सिर्फ एक छुट्टी का दिन समझकर उदासीन हो जाते हैं। किसी भी महापुरुष, मसलन उदाहरण के लिए गांधी जी या महावीर जी जयंती हो, उनके आदर्शों को, अपनाने का दिन होता है। हमें उनके आदर्शों का अनुकरण करना चाहिए। मौजूदा दौर में हमारी शिक्षा व्यवस्था में यह सद्भाव व मेल-मिलाप की सीख देने वाले अध्याय गायब होते जा रहे हैं। हर राजनीतिक दल के अपने-अपने एजेंडे हैं। ये राजनीतिक दल संकीर्ण लाभ के लिए इतिहास के साथ खिलवाड़ तो करते हैं, मगर त्योहारों के मकसद और महापुरुषों के आचरण को अमल में लाने के लिए प्रयास नहीं करते। फिर हमारा समाज भी इस दिशा में निष्क्रिय बना रहता है।

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हकीकत में होली के त्योहार से जुड़े रस्मो-रिवाजों के अपने गहरे मतलब हैं। वृंदावन में लठमार होली का मतलब स्त्री के महत्व को स्वीकार करने का भाव पैदा करना तो है ही, साथ ही समाज में स्वस्थ हास्य-भाव पैदा करना भी है। सब लोग हंसी-खुशी मिल-जुलकर त्योहार मनाएं, ये मकसद भी होली की परंपराओं का है। यह भी मकसद कि देशभर में लोग होली अच्छे संस्कारों के साथ खेलें। आपस में मिलजुलकर संवेदनशील व्यवहार करें। ताकि हमारे समाज में प्यार-मोहब्बत बढ़े। यह भी कोशिश हो कि समाज में किसी भी तरह का टकराव टाला जाए। इस त्योहार के मौके पर हमारे स्वयंसेवी संगठनों, युवाओं तथा खिलाड़ियों को समाज में समरसता व सद्भाव के रंगों को चटख बनाने का प्रयास तो करना ही चाहिए। बड़े दुख की बात है कि इस बार वृंदावन से बड़ी संख्या में ऐसी खबरें आने की बात कही जा रही है जब रंग लगाने के बहाने महिला श्रद्धालुओं के साथ अभद्रता की गई। उनके अंगों के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ी हैं। आस्था से यह खिलवाड़ बंद होना चाहिए।

होली से जुड़ा दूसरा चिंताजनक पक्ष यह है कि देशभर में होली के मौके पर लड़कियों के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ जाती हैं। शोहदे होली के दिन को छेड़छाड़ करने का लाइसेंस मान लेते हैं। नशाखोरी इस त्योहार का सबसे बुरा पक्ष है। लोग तरह-तरह का नशा इस दिन करते हैं। ये हरकतें इस त्योहार के पवित्र मकसद को दूषित करती हैं। कई जगह तो कीचड़ से होली खेलने की परेशान करने वाली खबरें भी सामने आती हैं। कई जगह तैलीय रंग डालने के मामले सामने आते हैं। ये रंग जल्दी से उतरते भी नहीं हैं, जो हमारी त्वचा को खराब करते हैं और काफी प्रयासों के बाद भी साफ नहीं होते। जैसे चीनी डोर का संकट समाज में बना हुआ है, वैसे रासायनिक रंगों का संकट भी बरकरार है। ये रासायनिक रंग हमारी आंख, त्वचा व बालों के लिए खासा नुकसानदायक होते हैं। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि गुणवत्ता के मानकों वाला रंग ही बाजार में बेचा जाए। सरकारी सख्ती से नकली व नुकसानदायक रंगों पर रोक लगाने की कवायद सिरे चढ़ सकती है।

इन दिनों बाजारों में मिलने वाले चमकीले रासायनिक रंग ललचाते तो हैं, परंतु वे हमारी त्वचा, आंखों और बालों को नुकसान पहुंचाते हैं। इन रासायानिक रंगों से त्वचा में जलन, आंखों में किरकिरी, सांस संबंधी दिक्कतें पैदा हो सकती हैं। इतना ही नहीं, ये रंग हवा और पानी को खराब कर पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाते हैं। हम कोशिश करें कुदरती रंगों को ही अपने इस्तेमाल में लाएं। अब चाहे घर के लोग हों या बाहर के। हमारे पूर्वजों ने फूलों, सब्जियों और जड़ी-बूटियों से बने कुदरती रंगों को हमेशा तरजीह दी है। ये रंग हमारे चेहरे और आंखों को नुकसान नहीं पहुंचाते। पर्यावरण के भी मित्र होते हैं ऐसे रंग। इन रंगों को बनाना कोई मुश्किल काम भी नहीं है। अरारोट पाउडर व चुकंदर के रस से गुलाबी रंग बन सकता है। इसी तरह पीले रंग के लिए हल्दी व हरे रंग के लिए पालक व पुदीने के पत्ते इस्तेमाल में लाए जा सकते हैं। इसी प्रकार लाल रंग के लिए गुड़हल व टेसू के फूल का प्रयोग किया जा सकता है। ऐसे में हम स्वच्छ होली से खुद, परिवार व मित्रों को राहत दे सकते हैं।

हाल के दिनों में त्योहारों के आयोजन में बाजार का दखल बहुत ज्यादा बढ़ा है। अभी हाल ही में हम फरवरी में वेलेंटाइन डे के कथित त्योहारों की शृंखला मना चुके हैं। इस दौरान टेडी बीयर, फूल, कार्ड, चॉकलेट आदि बेचने के लिए बाजार की आक्रामक रणनीति देखने में आई। होली के त्योहार पर भी बाजार का दखल लगातार बढ़ता ही जा रहा है। सूचना माध्यमों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर होली पर खरीदारों को बाजार तक लाने की तरह-तरह की स्कीमें आती रहती हैं। होली के पकवान व मिठाई के लिए लोगों को लुभाने के लिए बाजार द्वारा तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं।

राजनीतिक दल भी रंगों की गंगा में हाथ धोने से नहीं चूकते। जगह-जगह होली पर मिलन समारोहों का आयोजन किया जाता है। मकसद सिर्फ वोटों का ध्रुवीकरण होता है। जिन राज्यों में आगामी महीनों में चुनाव होने हैं, वहां तो होली मिलन समारोह के जरिये वोटरों को लुभाने की कोशिश और ज्यादा की जाती रही है। लेकिन त्योहार की आत्मा से उनका कोई लेना-देना नहीं होता है। राजनेताओं को हमारे तिरंगे के मर्म को समझना चाहिए। भले ही तिरंगे के रंग शांति, समृद्धि और शौर्य के प्रतीक हों, लेकिन ये रंग दरअसल हमारी बहुधर्मी संस्कृति का ही पोषण करते हैं। इन रंगों का संदेश यही है कि हमारा समाज इंद्रधनुषी रंगों से बना है। जब सात रंग आपस में मिल जाते हैं तो इंद्रधनुष बनकर सामने आता है। एकता और सद्भाव से ही कोई समाज बहुरंगी मोहक आभा बिखेरता है। होली का यही मंतव्य है कि हम मनभेद भुलाकर एकता के रंग में रंग जाएं।

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