चर्चित चेहरा

तिनका-तिनका जोड़ ज्ञान ज्योति जलाने का जुनून

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अरुण नैथानी

अरुण नैथानी

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चर्चित कार्यक्रम ‘मन की बात’ में चंडीगढ़ के संदीप कुमार द्वारा गरीब विद्यार्थियों का भविष्य संवारने वाले अभिनव शिक्षा अभियान का जिक्र किया। इससे पहले चंडीगढ़ के अधिकांश लोग इस युवक के पुरुषार्थ व सेवा की मुहिम से परिचित नहीं थे। प्रधानमंत्री की टिप्पणी से संदीप और उनके स्वयंसेवी संगठन के कार्यकर्ता खासे उत्साहित हैं। वे सुर्खियों में हैं और उनका मनोबल बढ़ा है।

हरियाणा के जिला भिवानी की तहसील तोशाम स्थित गांव ढाणीमाऊ के संदीप कुमार एक बेहद संवेदनशील इंसान हैं। जब जेबीटी के प्रशिक्षण के लिये वे हरियाणा गये तो उन्होंने देखा कि तीसरी क्लास के बहुत सारे छात्र-छात्राओं के पास पढ़ाई की मूलभूत चीजें—किताब, रजिस्टर व पेंसिल आदि तक नहीं हैं। इस बाबत जब उन्होंने अभिभावकों से बात की तो पाया कि उनके पास इतने पैसे तक नहीं थे जो ठीक से खाना भी खा सकें। इसके बाद संदीप ने संकल्प लिया कि निर्धन बच्चों के लिये शिक्षा सामग्री जुटाने के लिये समाज के लोगों को जागरूक किया जाना चाहिए।

चंडीगढ़ आने के बाद संदीप ने सोचा कि सिटी ब्यूटीफुल कहे जाने वाले इस शहर की स्लम बस्तियों का अवलोकन किया जाये। क्या यहां भी ऐसे परिवार हैं जो अपने बच्चों को पढ़ने-लिखने का सामान तक नहीं दे पाते। उन्होंने पाया कि यहां की स्लम बस्तियों में स्थिति और ज्यादा बदतर है। दरअसल, चंडीगढ़, पंचकूला व मोहाली में बड़ी संख्या में स्लम बस्तियां हैं, जहां बिजली-पानी जैसी मौलिक सुविधाओं का भी अभाव है। संदीप ने इन बस्तियों के बच्चों के लिये काम करने का संकल्प लिया। फिर इस तरह शिक्षा अभियान के लिये घर-घर जाकर किताबें एकत्र करने की शुरुआत हुई। लोगों को जागरूक किया गया। शुरू में तो दिक्कत जरूर हुई लेकिन लोगों को विचार अच्छा लगा। लोग मदद के लिये आगे आये। शिक्षा प्रसार में सहायक चीजों की उपलब्धता बढ़ती गई। फिर अभियान में नये कार्यक्रम जुड़ते गये। लोगों से पुरानी किताबें एकत्र की गईं और जरूरतमंदों तक पहुंचायी गईं। सोशल मीडिया के जरिये जरूरतमंदों से संपर्क किया गया।

संदीप ने पास के खुड्डा लाहौरा में कमरा लेकर अपने ‘ओपन आइज फाउंडेशन’ का कार्यालय व लाइब्रेरी खोली। धीरे-धीरे कई जागरूक लोग संगठन से जुड़े। संदीप बताते हैं कि इसके लिये तेरह हजार रुपये का किराया वे अपनी जेब से देते हैं। बाकी संगठन के सदस्य व स्वयंसेवक सहयोग करते हैं। लोगों से पुरानी चीजें एकत्र करते हैं। पुरानी किताबें, कापी और पेन लेकर उन्हें उपयोगी बनाया जाता है।

संदीप कहते हैं जब इरादा नेक हो और मन में संकल्प हो तो सभी काम पूरे होते हैं। साधन जुटते चले जाते हैं। वे बताते हैं कि आज संगठन से पांच सौ सदस्य व स्वयंसेवक जुड़े हैं, जिनमें ज्यादातर कॉलेज के विद्यार्थी, अध्यापक, प्रोफेसर, वकील, डाक्टर और विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित लोग शामिल हैं।

यह पूछे जाने पर कि अपने मूल राज्य हरियाणा में भी किसी ऐसे अभियान के बारे में सोचा है। वे कहते हैं कि मन में इच्छा भी है और इरादा भी, यदि कहीं हमें जगह मिल जाये तो एेसे अभियान की शुरुआत कर सकते हैं। बल्कि हमें मौका मिले तो हम पूरे देश में ऐसी मुहिम चलाने की मंशा रखते हैं।

प्रधानमंत्री की तारीफ पर कैसा लगा? इस पर संदीप कहते हैं कि निस्संदेह इससे हमारी टीम का मनोबल बढ़ा कि हमारे काम को पहचान मिल रही है। पहले पंजाब के मुख्यमंत्री ने भी तारीफ की, लेकिन किसी सरकार से मदद नहीं मिली। कोई जगह मिल जाये तो हम अपने अभियान को बड़े पैमाने पर चला सकते हैं। वे बताते हैं कि कंसल्टेंसी व ई-कॉमर्स के जरिये वे जीवनयापन करते हैं और बचे धन को इस पुनीत काम में लगाते हैं।

28 वर्षीय संदीप का परिवार चंडीगढ़ में ही रहता है। पिता राजकुमार उनके बीच नहीं रहे, मां व भाई-भाभी के साथ रहते हैं। मां फूलपति ने तो पहले नाराजगी जताई कि अपने करिअर के बारे में सोचे, कल शादी होगी तो कैसे जिम्मेदारी निभायेगा। लेकिन अब कहती है कि तुझे अच्छा लगता है तो सेवा करता रह। संदीप कहता है कि वह जीवनपर्यंत ब्रह्मचारी रहकर सेवा करना चाहता है ताकि सेवा कार्य पारिवारिक दायित्व निभाने से बाधित न हो।

संदीप का संगठन इसके अलावा कई रचनात्मक अभियानों से जुड़ा है। महिला सशक्तीकरण के अभियानों के अलावा स्लम इलाकों में गरीब महिलाओं को नि:शुल्क सैनेटरी पैड उपलब्ध कराये जा रहे हैं। साथ ही लॉकडाउन के दौरान मिले समय का लाभ उठाकर दृष्टिबाधित छात्र-छात्राओं के लिये चालीस पुस्तकें रिकॉर्ड करवायी हैं। उन्हें इसके ऑडियो उपलब्ध कराये जायेंगे। इसको लेकर जल्दी ही एक प्रोजेक्ट लॉन्च किया जायेगा। संदीप के प्रयासों से गरीब बच्चों तक किताबें पहुंचाने के लिये एक वैन की व्यवस्था की गई है। संदीप बताते हैं कि उन्होंने डेढ़ लाख में वैन खरीदी और डेढ़ लाख रुपये और खर्च करके उसे अपनी जरूरतों के हिसाब से तैयार किया। उनके प्रयासों से अब तक तीस हजार पुस्तकें बांटी जा चुकी हैं और करीबन पंद्रह हजार छात्र इससे लाभान्वित हुए हैं। भविष्य में ड्रीम प्रोजेक्ट के बारे में वे कहते हैं कि वे एक बड़ी बस में चलती-फिरती लाइब्रेरी तैयार करना चाहते हैं। साथ ही डिजीटल प्लेटफॉर्म के जरिये बच्चों को जीविका-उपार्जन के लिये तैयार करना चाहते हैं।

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