तिरछी नज़र

ज़माने तक सुलगती पल भर की आग

ज़माने तक सुलगती पल भर की आग

शमीम शर्मा

शमीम शर्मा

आग चूल्हे में जले या चिता पर, धुआं हमेशा आसमान की ओर ही जाता है। या धुआं उधर ही जायेगा, जिधर आप बैठे हैं। एक बात तो है कि आग देखकर खुदा जरूर याद आता है और हम ऊपर आकाश की ओर देखने लगते हैं। दुष्यन्त ने बरसों पहले कहा था :-

तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में सही

हो कहीं भी आग किन्तु आग जलनी चाहिये।

पता नहीं लोगों ने सीने में कैसी-कैसी आग पाल रखी हैं। तभी तो लड़कियां बड़ी आसानी से गा लेती हैं—बीड़ी जला ले जिगर से पिया, जिगर में बड़ी आग है। इधर, लाखों लोगों के घरों में चूल्हे की आग ही मुश्किल से सुलग पाती है और लोग दिलों में अंगारे सुलगाये घूमते हैं। इनके इरादों में भी आग भरी रहती है। इन्हीं अंगारों से वैर की लपटें निकलती हैं। पर बरसों पुरानी इस किस्म की आग के लिये कोई फायर सेफ्टी सिस्टम अभी तक नहीं बन पाया है।

नफरत की आग हो या आशिकी की आग, इस आग को प्यार की बूंदें ही काबू कर सकती हैं। पर कोई प्यार सने खतों को फूंकने में लगा है तो कोई अपने ख्वाबों को धुआं करने में जुटा है। दिल जलने पर हालांकि राख तो नहीं होती पर आदमी खाक जरूर हो जाता है। कैफ भोपाली ने कहा है :-

आग का क्या है पल दो पल में लगती है

पर बुझते-बुझते एक जमाना लगता है।

कुछ लोगों को तो अगरबत्ती जलाने में भी चार तीलियां फूंकनी पड़ती हैं और कुछ बातों-बातों में ही आग लगाकर चलते बनते हैं। कइयों के तो खून में ही आग होती है। ऐसे लोग उबलते ही रहते हैं। ना जगह देखते हैं, ना हालात।

घर फूंक तमाशा देखने वालों की भी कमी नहीं है। एक समय था जब कबीर ने आह्वान किया था—जो घर फूंके आपनौ, चले हमारे साथ। हम अपने स्वार्थों के लिए सच्चाई को सुलगता देखकर भी खामोश हो जाते हैं। ऐसे ही एक सत्य के बारे में किसी मनचले का कहना है कि जब बेगम पूछती है कि घीया की सब्जी कैसी बनी तो उस समय सत्य भी परेशान होकर परास्त हो जाता है।

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एक बर की बात है अक सुरजा अपणे छोरे नत्थू के कमरे मैं गया तो धुआं देखकै बोल्या—रै यो धुआं किसा है? नत्थू बोल्या—माच्छर खात्तर धुआं कर‍्या है। उसका बाब्बू बोल्या—पर बदबू तो बीड़ी की हो री है। नत्थू बोल्या—मन्नैं सोच्ची अक बीड़ी भी तो जानलेवा है।

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