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दीवार पर टंगी डिग्री और आंगन में भैंस की कमाई

तिरछी नज़र

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आज के डिग्रीधारी छोरे लैपटॉप खोलना जानते हैं, पर नल की टोंटी नहीं खोल सकते कि पानी का रिसना बंद कर दें।

छोरा रिजल्ट आते ही घर आकर रुआंसे से अंदाज में बोला- ताऊ, मैं तो फेल होग्या। ताऊ ने बिना पलक झपकाए कह दिया- तो कुण सा कुम्भ का मेला सै जो बारह साल बाद आवैगा? आगले साल फेर परचा भर दियो। जा इब जाके धार काढ़ ले। फिर उसका दोस्त थोड़ा अकड़ कर बोला-ताऊ, मैं तो फर्स्ट डिवीजन तै पास होग्या। ताऊ ने तब भी वही तराजू निकाला और कहा- तो कुण सा पटवारी लाग ग्या? जा जाके धार काढ़ ले।

धार काढनी ही आ जाए तो आदमी कम से कम गाय-भैंस बांध लेगा। वे दूध देंगी, रिज्यूमे नहीं मांगेगी। डेयरी चलेगी, फलेगी। समय ऐसा आ गया है कि अब पेट गाय-भैंस समझती हैं, कॉलेज-यूनिवर्सिटी नहीं। समझदार ताऊ इसलिए कहता है- डिग्री दीवार पर टंगी रह जाएगी और भैंस आंगन में बंधी कमाई दे जाएगी। उसका इशारा है कि कागज पढ़ा-लिखा हो सकता है, पर आदमी तब तक अनपढ़ है जब तक उसके हाथ में किसी काम का कौशल नहीं।

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ताऊ की बात पहली नजर में कड़वी लगती है, पर उसकी जड़ में जिंदगी का खरा सच छिपा है। गांव का ताऊ जानता है कि कागज की डिग्री पेट नहीं भरती, पेट तो हाथ की कारीगरी भरती है। खेत में हल चलाने वाला, लोहे पर चोट करने वाला, लकड़ी पर रंदा मारने वाला, कढ़ाई में पकौड़े-जलेबी तलने वाला, मोमो-बर्गर की रेहड़ी चलाने वाला- ये सब बिना डिग्री के भी अपनी दुनिया चला देते हैं। आज के डिग्रीधारी छोरे लैपटॉप खोलना जानते हैं, पर नल की टोंटी नहीं खोल सकते कि पानी का रिसना बंद कर दें। आज वाले बैठे-बैठे सी.वी. बनाते हैं, पर और कुछ नहीं बना पाते।

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डिग्री रास्ता दिखा सकती है, पर चलना हुनर सिखाता है। और जिंदगी में वही आगे बढ़ता है, जिसके हाथ में काम की पकड़ हो। इसीलिए बड़े लोग आज भी यही कहते हैं- पढ़ लो, आगे बढ़ लो पर खाली हाथ मत रहो। डिग्री जेब में होना भी जरूरी है और साथ में अपने हाथों पर भरोसा रखना भी। सरकारी नौकरी के चक्कर में जवानी चली जाती है और बाकी का जीवन किस्मत को कोसने में बीत जाता है। एक मनचले का कहना है कि डिग्री धोखा दे सकती है पर घर में बंधी गाय-भैंस रोज दूध देंगी।

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एक बर की बात है अक नई ब्याही आई रामप्यारी बीस-पच्चीस हजार का एक झबरू कुत्ता खरीद ल्याई। उसकी सास ताना सा मारते होये बोल्ली- आं ए! कुत्ता ल्याई, इसतै बढ़िया तो एक गाय लेकै आती, दूध तो पीती। रामप्यारी बोल्ली- मां जी! मैं दूध नहीं, चाय पीती हूं। सास्सू तपाक दे सी बोल्ली- तो बेट्टी यो चाय जोग्गा दूध देवैगा के?

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