ब्रिटेन की एक प्रोफेसर बारबरा सहाकियन ने अमेरिका के दस हजार बच्चों पर एक शोध किया। शोध के निष्कर्ष के तौर पर बारबरा ने बताया कि जो बच्चे छुटपन से ही शौक के लिए पढ़ने लगते हैं, बड़े होकर उन्हें दूसरों से बातचीत करने, जुड़ने और जीवन में आगे बढ़ने में बहुत सहायता मिली। उनका स्क्रीन टाइम भी कम हुआ।
अक्सर कहा जाता है कि इन दिनों लोगों की पढ़ने में दिलचस्पी नहीं रही। मोबाइल और सोशल मीडिया ने इसे और कम किया है। कुछ पहले तक किसी भी चीज पर फोकस दो मिनट कहा जाता था, अब वह चालीस सेकेंड भर का रह गया है। ऐसे में कोई मोटे-मोटे ग्रंथ क्यों पढ़े, जबकि सोशल मीडिया पर देखने-पढ़ने को इतना कुछ है। बड़ी से बड़ी किताबों के दो मिनट में पढ़े जाने वाले सारांश या रील्स और वीडियोज मौजूद हैं।
लगभग दो दशक पहले अखबारों में माना जाने लगा था कि युवा वर्ग अखबारों में छपे लंबे-लंबे लेख, कहानियां, संपादकीय आदि नहीं पढ़ना चाहता। उसकी भाग-दौड़ की जिंदगी में पढ़ने के लिए उसके पास समय नहीं है। इसलिए इनके आकार छोटे कर दिए गए। इसका कारण यह था कि बताया जा रहा था कि अपने देश में युवाओं की संख्या पैंसठ प्रतिशत है। उन्हीं की जेब में पैसे हैं, इसलिए पोटेंशियल बायर और पाठक वही हैं। इसलिए जैसा वे चाहते हैं, वैसा ही किया जाए। हालांकि, इस कारण से युवाओं ने पढ़ना शुरू किया था, यह महसूस नहीं हुआ। जबकि इसके विपरीत जमीनी हकीकत यह नजर आती रही है कि अखबारों, किताबों और पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने वाले बड़ी उम्र के लोग हैं। आज भी बुजुर्गों को बड़ी संख्या में अखबार और किताबें पढ़ते देखा जा सकता है, क्योंकि वे उन्हें विश्वसनीय मानते हैं। इसके अलावा, किताबें और अखबार पढ़ने से न आंखों पर जोर पड़ता है, न बिजली का अतिरिक्त बिल आता है। नेट चले न चले, इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता।
इन दिनों तो किताबों को ऑनलाइन फोन, लैपटॉप आदि पर आसानी से पढ़ा जा सकता है। ऐसे में पढ़ने की दिलचस्पी क्यों कम होती जा रही है, यह सोचने की बात है। जबकि शहर-दर-शहर बड़े-बड़े पुस्तक मेले भी लगते हैं। इनमें किताबों की बिक्री भी खूब होती है। बहुत से लोग कहते हैं कि दरअसल ज्यादा किताबें सरकारी खरीद में बिकती हैं। व्यक्तिगत और निजी बिक्री बहुत कम होती है।
हाथ-हाथ में मोबाइल आने और स्क्रीन टाइम बढ़ने के कारण दुनिया भर में चिंता प्रकट की जा रही है। इस समय को किस तरह से कम किया जाए, इस पर बहुत से विद्वान माथापच्ची कर रहे हैं। एक समय ऐसा था, जब मान लिया गया था कि हमें जीवन से कागज और किताबों की विदाई करनी है। स्क्रीन में ही हमारा भविष्य छिपा है। लेकिन अच्छे परिणाम न देखकर बहुत कुछ बदल भी रहा है। स्वीडन में लगभग पंद्रह साल पहले बिल्कुल छोटी, यानी प्राथमिक कक्षाओं में ही बच्चों को लैपटॉप दे दिए गए। उन्हें सारी पढ़ाई-लिखाई इन्हीं पर करनी थी। कक्षा से किताबों और कॉपियों की विदाई हो गई। लेकिन पता चला कि इस कारण से बच्चों ने नया कुछ नहीं सीखा। ध्यान केंद्रित करने में कमी आई। वे आपस में एक-दूसरे से मिलने-जुलने, खेलने में कम दिलचस्पी लेने लगे और बच्चे चिड़चिड़े हो गए। उनका गुस्सा बढ़ा। वे नया कुछ सीखने से बचने लगे। बालपन में ही उन्हें गर्दन, कमर और रीढ़ की हड्डियों की समस्याओं ने घेर लिया। तब वहां की सरकार ने बाकायदा इसका अध्ययन कराया। इस अध्ययन के निष्कर्ष के आधार पर ही अब वहां के स्कूलों में कॉपी, किताबों की वापसी हो गई है। अन्य बहुत से देश भी इस बारे में सोच रहे हैं।
हाल ही में सिंगापुर के बारे में भी पता चला कि वहां किताबें पढ़ने के लिए विशेष प्रोत्साहन योजना शुरू की गई है। सिंगापुर की सरकार पूरे विश्व में पहली सरकार है, जिसने इस तरह की योजना शुरू की है। इसके अनुसार आपको ऑनलाइन पंद्रह मिनट पढ़ना है। यदि कोई इस तरह के पचास सेशन पूरे कर लेगा, तो इनाम के तौर पर उसे सिंगापुर में चलने वाला एक डॉलर दिया जाएगा। लेकिन इसमें एक शर्त यह भी है कि एक दिन में आप जितना भी पढ़ेंगे, उसे एक ही सेशन माना जाएगा। इसलिए पचास दिन तक पढ़ने पर ही एक डॉलर मिलेगा। सरकार को लग रहा है कि इस तरह से लोगों में पढ़ने की जो आदत छूट गई है, उसे वापस लाया जा सकेगा। बहुत से लोग इस योजना का स्वागत कर रहे हैं, लेकिन बहुत से कह रहे हैं कि पढ़ना आनंद के लिए होता है। यदि इसे भी पैसा कमाने का जरिया बना लिया जाएगा, तो आनंद ही खत्म हो जाएगा।
ब्रिटेन की एक प्रोफेसर बारबरा सहाकियन ने अमेरिका के दस हजार बच्चों पर एक शोध किया। शोध के निष्कर्ष के तौर पर बारबरा ने बताया कि जो बच्चे छुटपन से ही शौक के लिए पढ़ने लगते हैं, बड़े होकर उन्हें दूसरों से बातचीत करने, जुड़ने और जीवन में आगे बढ़ने में बहुत सहायता मिली। उनका स्क्रीन टाइम भी कम हुआ। नींद भी अच्छी आई। इसका कारण यह है कि हम किसी की लिखी किताब पढ़ते हैं, तो हमें दूसरों के विचारों और जीवन को समझने में मदद मिलती है।
इसी तरह हम दूसरों के लिखे से सीखकर अपनी जिंदगी को भी बेहतर बनाने की सोचते हैं। अकेलापन भी कम महसूस होता है, क्योंकि किताबों को मनुष्य का सबसे बेहतर दोस्त बताया जाता है। यह भी लगता है कि पढ़कर हम बहुत कुछ जान सकते हैं। अच्छी बातें भी सीख सकते हैं। पढ़ने से हमारी ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी बढ़ती है। यही नहीं, पढ़ते वक्त हमारा ध्यान किसी कहानी, कविता, लेख आदि में रहता है, तो दुनिया की तमाम समस्याओं और अपनी परेशानियों से भी दूर हो जाते हैं। हमारा तनाव कम होता है, किसी विषय पर फोकस करने की क्षमता भी बढ़ती है। पढ़ने के लिए किसी आयु का भी बंधन नहीं है। बालपन से लेकर बुजुर्ग अवस्था तक, पढ़ना कभी भी शुरू किया जा सकता है। कहीं भी बैठकर पढ़ा जा सकता है—घर में, पार्क में, लाइब्रेरी में, यात्राओं के दौरान।
कौन-सी किताब पढ़ें, इसके लिए हमारी रुचियां भी भिन्न हो सकती हैं। जैसे कि किसी को कहानियां पसंद हैं, तो किसी को कविताएं, लेख। कहानियों, कविताओं और लेखों के भी विषय भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। कोई हास्य कहानी पसंद करता है, तो किसी को प्रेम कथाएं पसंद हैं। कोई जासूसी कहानियों का दीवाना है, तो किसी को खजाने की खोज संबंधी कहानियां पसंद हैं। यही हाल कविताओं का है। किसी को छंद पसंद है, तो किसी को अतुकांत कविता, हास्य कविता, प्रेम, वीर रस, प्रकृति से जुड़ी कविताएं। नायकों, यात्रा वृत्तांत, शहरों, कस्बों, गांवों के वर्णन आदि से जुड़ी किताबें भी बहुत से लोग पसंद करते हैं।
पढ़ने से न केवल हमारी जानकारियां बढ़ती हैं, बल्कि एक किताब खत्म होने के बाद अक्सर दूसरी किताब पढ़ने का मन करता है। किताबों को आखिर हमारा सबसे बड़ा मित्र यूं ही तो नहीं कहा जाता। हमारे समाज में तो किताब को विद्या और सरस्वती के स्थान पर माना जाता है। इसीलिए यदि पुस्तक कभी नीचे गिर जाए, तो उसे उठाकर माथे से लगाया जाता है।
ऑनलाइन पढ़ाई के समय में ये बातें कुछ दूर हो गई हों, लेकिन किताबें हमारे जीवन को बदल सकती हैं, परेशानियों को दूर करती हैं, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करती हैं।
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।

