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अटूट महराब पंजाब की स्थापना के 60 साल

पंजाब भारत गणराज्य का पहरुआ है, सहज प्रवृत्ति से। पुनर्गठन के साठ साल बाद, यह राज्य फिर से इतिहास की दहलीज पर खड़ा है। यह एक ऐसा समाज है जो कठिनाई को हास्य में और बलिदान को गर्व में बदल...

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पंजाब भारत गणराज्य का पहरुआ है, सहज प्रवृत्ति से। पुनर्गठन के साठ साल बाद, यह राज्य फिर से इतिहास की दहलीज पर खड़ा है। यह एक ऐसा समाज है जो कठिनाई को हास्य में और बलिदान को गर्व में बदल देता हो, इतना सहनशक्ति युक्त जिसको कोई संकट तोड़ नहीं सकता। 

मजबूती कभी भी संयोगवश नहीं मिलती; बल्कि यह एक विरासत है। हरेक सभ्यता के चरित्र की परीक्षा सरहद पर जाकर होती है, और भारत की आत्मा के लिए, वह सरहद हमेशा पंजाब रही है। गुरु नानक की शांत सार्वभौमिकता से लेकर भगत सिंह की ललकार तक, पंजाब ने सिर्फ़ एक सीमा की रक्षा नहीं की है; इसने गणतंत्र की चेतना को आकार भी दिया। चंद इलाकों की यादों में इतना दुख, सेवाभाव, और सहज वृत्ति भरा आलोक होगा।

पुनर्गठन के साठ साल बाद, पंजाब फिर से इतिहास की दहलीज पर खड़ा है। विभाजन ने परिवारों, खेतों व आस्था को बांट दिया था, फिर भी पंजाब टूटा नहीं। इसने भस्म हुई भूमि से अपनी उपजाऊ मिट्टी का पुननिर्माण किया और एक भूख से जूझते राष्ट्र का पेट भरा। जब 1966 में नई सीमा रेखाएं खींची गईं, तब पंजाब ने शांति के साथ उन्हें भी जज़्ब किया, जो जानते हैं कि भूगोल बदल सकता है, लेकिन चरित्र नहीं। जब 1980 के दशक में उग्रवाद का अंधेरा छाया, तो जहां इसके किसान बेटे ने थकी हुई ज़मीन से जीवन निकाला तो वहीं सैनिक पुत्र ने मोर्चा संभाले रखा। पंजाब ने शोर-शराबे से नहीं, बल्कि निष्ठापूर्वक सहन किया।

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ये यादें आधार का मूल ढांचा बनाती हैं, वह गहरी अनदेखी किरण जिसने गणतंत्र को बार-बार तूफानों में स्थिर रखा। एक ऐसा समाज जो कठिनाई को हास्य में और बलिदान को गर्व में बदल देता हो, इतनी सहनशक्ति युक्त जिसको कोई संकट तोड़ नहीं सकता। जब कभी परीक्षा की घड़ी आई, तो पंजाब की प्रवृत्ति पीछे हटने की नहीं रही, बल्कि खुद को स्थिर करते हुए राष्ट्र को भी स्थिरता दी।

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सहनशक्ति की संपूर्ण कीमत : तथापि,सहनशक्ति की भी गंभीर कीमत होती है। बार-बार सरहद पर खड़े रहने का मतलब है तनाव के कहीं और फूट पड़ने से पहले ही उसे जज़्ब कर लेना। थकावट खुद को असफलता के रूप में घोषित नहीं करती; बल्कि यह घटता मुनाफा, टलता नवीनीकरण, और इस मौन अनुमान से है कि सहनशक्ति अनिश्चित काल तक खुद-ब-खुद भरपाई करती रहेगी। उपजाऊ मिट्टी का ह्रास, सीमित विकल्प और एक पीढ़ी जो तेज़ी से विदेशों की ओर खिंची चली जा रही है, इन सबके बीच पंजाब यह कीमत बिना किसी शिकायत के सहता आया है। मामला हमदर्दी का नहीं, यथार्थवाद का है। नवीनीकरण तब ज़रूरी नहीं होता जब पतन आसन्न हो, बल्कि जब धीरज बहुत ज़्यादा खिंच चुका हो।

बयानबाजी से सुधार की ओर : अनुशासन के बिना आशावाद भ्रम बन जाता है। पंजाब सिर्फ़ भावनाओं के आधार पर आगे नहीं बढ़ सकता। नवीनीकरण संरचनात्मक होना चाहिए, न कि घटनाओं से जुड़ा, ज़िम्मेदारी पर आधारित, न कि शिकायत पर।

पंजाब का नवीनीकरण विभाजन द्वारा निर्मित बाधाओं के बोझ तले हो रहा है। यह कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है जिसकी समुद्र तट तक पहुंच नहीं। इसकी मिट्टी दशकों से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का बोझ उठाए है। इसकी प्रहरी ज़िम्मेदारियां बढ़ रही हैं, जो अब नशीले पदार्थों, ड्रोन और सीमा पार के आपराधिक नेटवर्क से और जटिल हो गयीं। ये इच्छाशक्ति की कमी नहीं, भूगोल और ज़िम्मेदारी की सच्चाई हैं।

किसी भी क्षेत्र को सिर्फ़ ढांचागत रूप से इस आधार पर नुकसान नहीं होना चाहिए कि वह वहां है जहां इतिहास ने उसे रख दिया। मदद, राष्ट्रीय सेवा की भरपाई के रूप में, आवश्यक रूप से नवीनीकरण मज़बूत करने वाली हो, न कि राजकीय खैरात की ओर धकेलने वाली। एक प्रहरी राज्य की सततता तमाशेबाजी से नहीं, संरक्षता निभाने पर टिकी होती है।

पंजाब का इतिहास एक और गंभीर सबक देता है। इसे शायद ही कभी अपने पल चुनने की विलासिता मिली हो; इसकी बजाय इतिहास इसे चुनता आया है। हर पीढ़ी को विरासत में खाली पन्ना नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारियों भरा खाता मिलता है, कुछ दिखाई देने वाली, कुछ अलिखित उसमें शामिल। जो लचीलापन प्रतीत होता है, वह निरंतरता है : खेत संभाले जाते हैं क्योंकि ऐसा करना ज़रूरी है, सीमाओं की रक्षा की जाती है क्योंकि किसी को वहां पहरे पर खड़ा होना है, संस्थानों को जारी रखा जाता है क्योंकि छोड़ देने पर मरम्मत खर्च ज्यादा आएगा। इस विरासत ने एक ऐसे स्वभाव को आकार दिया जो दिखावे के बजाय स्थिरता को, और टूटन की बजाय नवीनीकरण को महत्व देता है। अब काम पंजाब को फिर से बनाना नहीं, बल्कि सुनिश्चित करना है कि जो कुछ पीढ़ियों से चला आ रहा, वह लापरवाही से खत्म न होने पाए। आखिर, निरंतरता सिर्फ़ यादों से संरक्षित नहीं रहती; यह समय पर नवीनीकरण से बनी रहती है।

भीतरी नवीनीकरण के पांच स्तंभ :

1.पारिस्थितिक समझौता : पंजाब की कृषि सफलता एक समय देश के लिए एक बचाव बना। आज, नवीनीकरण को ज़मीन के साथ एक नये समझौते की ज़रूरत है। भविष्य बिना भरपाई वाला दोहन करने में नहीं, बल्कि संतुलन बनाने में है, मिट्टी की उर्वरता की पुनः बहाली, जल संचयन और पारिस्थितिकी संभाल को लागत की बजाय विरासत मानने में है। भूरी क्रांति (मृदा स्वास्थ्य बहाली और कृषि अवशेष प्रबंधन में सुधार) एक पारिस्थितिक समझौता है: मिट्टी को कारखाने के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवित विरासत मानने का संकल्प। अपनी ज़मीन का कार्बन संतुलन और इसकी प्रवृत्ति को बहाल कर, हम यकीनी बना सकते हैं कि ट्यूबवेल थमने के बहुत बाद भी पंजाब के खेत उपजाऊ रहें।

2.पलायन से आकांक्षा तक : कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता यदि हररोज उसकी उम्मीद (युवा) परदेस को पलायन करे। पंजाब को ऐसी जगह बनना होगा जहां आकांक्षा को विदेश ले जाने वाले पंखों की बजाय घर की जड़ें मिलें, जहां बसने के साथ ही स्वदेश की गरिमा, उद्देश्य व अवसर चुनने के रूप में देखा जाए। शिक्षा, कौशल और उद्यम को स्थानीय स्तर पर एक साथ आना होगा, ताकि भविष्य वहां बने जहां पहचान मज़बूत हो, न कि वहां जहां अपनापन न्यूनतम हो।

3.उद्योग बतौर स्थायित्व हो न कि विकल्प : पंजाब को कृषि को छोड़ने के लिए उद्योग नहीं चाहिए,बल्कि वह मूल्य संवर्धन से इसे मज़बूती देने वाला हो। मूल्य-संवर्धक उद्यम जैसे एग्रो-प्रोसेसिंग, कृषि संबंधी विनिर्माण, माल आवाजाही और सामग्री– जिसकी जड़ें ज़मीन और कौशल में हों, वह युवाओं, आत्मविश्वास और क्षमता को स्वदेश में बनाए रखेगी। प्रहरी राज्य में, उद्योग का अर्थ सिर्फ़ उत्पादन नहीं; जब घर, चूल्हा और उद्यम एक ही जगह हों, तो परिवार मज़बूत होते हैं, समाज को फ़ायदा होता है और सुरक्षा सुदृढ़ होती है।

4. पूर्व सैनिकों से मिलने वाला फायदा : सामग्री-संचालन, कृषि उत्पाद प्रसंस्करण, भूरी क्रांति, ड्रोन सेवाएं, साइबर सुरक्षा, शिक्षण, राष्ट्रमंडल एवं ओलंपिक प्रतियोगिताओं के लिए खेल तैयारी, और आपातकाल में प्रतिक्रिया बनाने में पूर्व सैनिकों द्वारा शुरू किए गए स्टार्टअप सैन्य क्षमता को नागरिक मूल्य में बदल देते हैं। पूंजी निवेश किसी सब्सिडी चालित आर्थिकी का नहीं आत्मविश्वास भरी अर्थव्यवस्था में होता है, और सेवानिवृत फौजी एक प्रहरी प्रांत की अर्थव्यवस्था में निर्णायक गुणक बन सकते हैं।

5.वैश्विक पंजाबी प्रवासी : अनिवासी भारतीय समुदाय दुनियाभर के बाजारों व संस्थानों में गहरे स्थापित है। गरिमा के साथ इन्हें जोड़ने पर,ये लोग पंजाब के नवीनीकरण को बढ़ावा दे सकते हैं, महज विदेश से पैसा भेजने वाले के रूप में नहीं, बल्कि साझा उद्देश्य में भागीदार के तौर पर, जो पंजाबियत में है। पंजाबी अनिवासी खेल प्रतियोगिताओं से लेकर साहित्य समारोहों तक, सांस्कृतिक और नागरिक मंच बनाकर इस जुड़ाव को आत्मविश्वास में बदल सकते हैं। प्रवृत्ति खुद रोशनी बनने की हो।

छठा स्तंभ : प्रहरी राज्यों के लिए विचार : सीमावर्ती क्षेत्रों पर कुछ ऐसे बोझ होते हैं जिन्हें नीतियां अक्सर अनदेखा करती हैं। जब भूमि, बाजार व सतर्कता राष्ट्रहित में समर्पित हों, तो कीमत स्थायी होती है। इसलिए प्रहरी राज्यों हेतु विशेष विचार करना रियायत न होकर नीतिगत हो, यह संतुलन व निष्पक्षता का मामला है। जहां भूगोल स्थायी राष्ट्रीय कर्तव्य सौंपता हो, वहां स्थायी राष्ट्रीय लागत भी साथ आती है। जहां समानता की भागीदारी संस्थागत नीतियों में निहित हो जाए, तब सहनशक्ति थकान की बजाय आत्मविश्वास संग टिकाऊ बनी रहती है। जो गणराज्य अपने प्रहरियों को मान्यता देता है, वह स्थिरता को सुरक्षित करता है।

महराब अटूट रहती है : सहनशक्ति, भले ही चरित्र में हो, असीमित नहीं होती। जो क्षेत्र सबसे लंबे समय तक मोर्चा संभाले रखते हैं, वे ऐसा अपने पारिस्थितिकी, सामाजिक और नैतिकता के भंडार इस्तेमाल करके करते हैं, जिन्हें अंततः नवीनीकृत करना पड़ता है।

पंजाब ने कभी भी अपने कर्तव्य को पुरस्कार से नहीं मापा, न ही अपने जुड़ाव को मान्यता दिए जाने की चाहत से। यह जहां खड़ा है, वहां इसलिए है क्योंकि इतिहास ने इसे वहां रखा है... क्योंकि चरित्र ने इसे वहां रखा है। पंजाब भारत का पहरुआ है, सहज प्रवृत्ति से। यह केवल गणराज्य में भाग ही नहीं लेता; उसे लय भी प्रदान करता है। मिट्टी को ठीक किया जा सकता है, युवाओं को स्वदेश में रहने के लिए जोड़ा जा सकता है, और प्रहरी को और ऊपर उठने दिया जा सकता है। पंजाब पहले खुद को स्थिर करेगा और ऐसा करते हुए, गणराज्य को संवार देगा।

लेखक सेना की पश्चिमी कमान के पूर्व कमांडर एवं पुणे इंटरनेशनल सेंटर के संस्थापक ट्रस्टी हैं।

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