अकुशल मजदूर से कम वेतन मिल रहा टीचर्स को : The Dainik Tribune

अकुशल मजदूर से कम वेतन मिल रहा टीचर्स को

सरकारी और गैर सरकारी में किया जा रहा भेद

अकुशल मजदूर से कम वेतन मिल रहा टीचर्स को

चंडीगढ़, 24 नवंबर (ट्रिन्यू)

यूटी प्रशासन चंडीगढ़ सरकारी और एडिड कालेजों में भेद कर रहा है। भले ही एडिड कालेजों को यूटी से 95 फीसदी ग्रांट मिलती हो लेकिन सरकारी कालेजों में तो कई नये नियम लागू हो गये पर एडिड में नहीं किये गये।

शहर के सात कालेजों-डीएवी कालेज-10, एमसीएम डीएवी कालेज-36, देव समाज कालेज-45, देव समाज कालेज आफ एजुकेशन -36, एसडी कालेज -32, गुरु गोबिंद सिंह कालेज-26, गुरु गोबिंद सिंह कालेज फार वूमेन-26 सरकारी सहायता-प्राप्त कालेजों में आते हैं।

किसी भी फैकल्टी मैंबर के 60 साल का होने पर सरकारी कालेज में तो एक्सटेंशन मिल रही है मगर एडिड में कहीं मिल रही है तो कहीं नहीं मिल रही है। एसडी, एमसीएम डीएवी और देव समाज कालेज ने अपने यहां सशर्त ऐसे टीचर्स को सेवा विस्तार दे दिया है मगर एसजीजीएसडब्ल्यू-26 की मैनेजमेंट ने रिटायर होने वाले टीचर्स को सेवा विस्तार ने मना कर दिया। यह बात अलग है कि डीएचई ने इस बारे में एक लेटर भी जारी कर दिया है कि ऐसे टीचर्स को एक्सटेंशन दी जा सकती है।

डीएवी कालेज-10 व एसडी कालेज सहित करीब तीन दर्जन ऐसे भी टीचर्स हैं जो हैं तो रेगुलर मगर प्रोबेशन पर रखे गये हैं। इन्हें एक अकुशल मजदूर से भी कम वेतन दिया जा रहा है। इन टीचर्स को तीन साल तक बेसिक सैलरी पर रखा जाता है और तीन साल के बाद ही पूरी सैलरी दी जाती है। इसमें भी यूटी प्रशासन और कहर ढा रहा है, पंजाब के सेवा नियमों के तहत पंजाब 21600 (बेसिक पे) दे रहा है जबकि यूटी मात्र 15600 रुपये ही दे रहा है हालांकि अब 2019 से इन्हें डीसी रेट पर वेतन दिया जाने लगा है। डॉ. दीपक गर्ग, इशिता,योगिता, मुमताज, निष्ठा सक्सेना, जतिंदर भल्ला, पुष्पिंदर, कुलविंदर, रूचिका, शम्मा और राघव खन्ना ने कहा कि अब जबकि सेंट्रल रूल लागू हो गये तो तीन साल के प्रोबेशन का कोई तुक ही नहीं और सेंट्रल नियमों में प्रोबेशन पर फुल सैलरी दी जाती है, सिर्फ बेसिक सैलरी देने की शर्त नहीं है। ऐसे में प्रोबेशन पर चल रहे तीन दर्जन से ज्यादा टीचर्स को फुल सैलरी दी जाये और सेवाएं नियमित की जायें। देश के किसी भी राज्य में प्रोबेशन पर मात्र बेसिक सैलरी देने का प्रावधान नहीं है, पंजाब में वित्तीय संकट के चलते पिछली सरकारों में यह नियम बना था, जो अभी तक चला आ रहा है।

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