Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

PGIMER Chandigarh : स्वास्थ्य क्षेत्र में अहम शोध; पीजीआई ने खोजा किडनी जांच का सटीक पैमाना, विदेशी मानकों पर निर्भरता होगी खत्म

डॉ. अशोक कुमार यादव के नेतृत्व में हुए शोध को 'इंडिया एलायंस' ने सराहा, भारतीयों के 'मसल मास' और खानपान के हिसाब से तैयार किया नया ईजीएफआर (eGFR) समीकरण

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

PGIMER Chandigarh : पीजीआईएमईआर (PGIMER) ने किडनी रोगों के सटीक इलाज और निदान की दिशा में एक बड़ी सफलता हासिल की है। संस्थान के एक्सपेरिमेंटल मेडिसिन एंड बायोटेक्नोलॉजी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार यादव की अगुवाई में हुए शोध ने साबित किया है कि किडनी की कार्यक्षमता (किडनी फंक्शन) मापने के पश्चिमी पैमाने भारतीयों पर पूरी तरह सटीक नहीं बैठते। इस महत्वपूर्ण शोध को बायो-टेक्नोलॉजी विभाग और वेलकम ट्रस्ट इंडिया एलायंस ने अपनी 'हेल्थ सिस्टम्स इन प्रैक्टिस: रिसर्च शेपिंग हेल्थकेयर डिलीवरी' सीरीज में प्रमुखता से प्रकाशित किया है।

Advertisement

पश्चिमी देशों के पैमानों से क्यों अलग हैं भारतीय?

आमतौर पर किडनी की कार्यक्षमता जांचने के लिए जिन समीकरणों का इस्तेमाल होता है, वे मुख्य रूप से यूरोप और उत्तर अमेरिका की आबादी पर आधारित हैं। पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में भारतीयों के शरीर में मांसपेशियों का द्रव्यमान (मसल मास) कम होता है और उनका खानपान भी अलग होता है। इन्हीं कारणों से पुराने विदेशी पैमाने भारतीयों पर सटीक नतीजे नहीं देते। इसे ध्यान में रखते हुए डॉ. यादव और उनकी टीम ने यूरोपियन किडनी फंक्शन कंसोर्टियम (EKFC) ईजीएफआर समीकरण को खासतौर पर भारतीय आबादी के लिए 'री-कैलिब्रेट' किया है। यह नई खोज क्रॉनिक किडनी रोग के सटीक निदान, दवाओं की खुराक तय करने और किडनी डोनर की सही जांच में मील का पत्थर साबित होगी।

Advertisement

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और स्थानीय समाधान

इस अहम शोध में पीजीआई के नेफ्रोलॉजी, बायोकैमिस्ट्री, फार्माकोलॉजी और स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ विभागों के साथ-साथ कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों ने सहयोग दिया। इनमें नई दिल्ली का जॉर्ज इंस्टीट्यूट, पुडुचेरी का जिपमेर, अमेरिका की टफ्ट्स यूनिवर्सिटी, ब्रिटेन का एवेलिना चिल्ड्रेन हॉस्पिटल और बेल्जियम की यूनिवर्सिटी ऑफ लीज शामिल हैं।

इस शोध का सबसे बड़ा संदेश यह है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में वही समाधान सबसे अधिक कारगर होते हैं, जो स्थानीय जरूरतों के हिसाब से तैयार किए जाते हैं। शोध का मार्गदर्शन करने वाले नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. एचएस कोहली ने जन स्वास्थ्य के बड़े लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आपसी सहयोग पर जोर दिया। वहीं, एक्सपेरिमेंटल मेडिसिन एंड बायोटेक्नोलॉजी के एचओडी प्रो. दिब्यज्योति बनर्जी ने इस प्रयास की सराहना करते हुए अन्य संकाय सदस्यों को भी ऐसे शोध के लिए प्रेरित किया है।

Advertisement
×