PGI Chandigarh : बच्चों के लिवर रोगों पर विशेषज्ञों का मंथन, सालाना 15 हजार से ज्यादा मरीज पहुंच रहे ओपीडी
समय पर पहचान ही बचाव का एकमात्र रास्ता: प्रो. आर.के. रठो
PGI Chandigarh : चंडीगढ़ पीजीआईएमईआर (PGIMER) के पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और हेपेटोलॉजी विभाग की ओर से 'पीडियाट्रिक कोलेस्टेसिस' (बच्चों में पित्त की रुकावट से संबंधित लिवर रोग) पर दो दिवसीय विशेष 'मोनोथैमेटिक कॉन्फ्रेंस' और चौथी 'प्रो. सरोज मेहता मेमोरियल ओरेशन' का रविवार को आगाज हुआ। पीजीआई के लेक्चर थिएटर-1 में आयोजित इस कार्यक्रम में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने बच्चों के लिवर रोगों की जटिलताओं और उनके समाधान पर चर्चा की।
आंकड़ों के जरिए विभाग की जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए विभाग की प्रमुख प्रो. साधना लाल ने बताया कि संस्थान में हर साल 15,000 से ज्यादा बच्चे ओपीडी में इलाज के लिए आते हैं। इसके अलावा सालाना 3,000 एंडोस्कोपिक प्रक्रियाएं और 1,000 से अधिक बच्चों को भर्ती कर इलाज दिया जा रहा है। ये आंकड़े न केवल बढ़ती मांग को दर्शाते हैं, बल्कि चिकित्सा क्षेत्र की बड़ी जिम्मेदारी की ओर भी इशारा करते हैं।
इलाज के साथ बच्चों का सामाजिक समावेश जरूरी: प्रो. साधना लाल
प्रो. साधना लाल ने विभाग की कार्यप्रणाली पर जोर देते हुए कहा कि 'मरीज पहले' (Patient First) ही हमारा मुख्य सिद्धांत है। उन्होंने कहा कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बच्चों को न केवल बेहतर इलाज की जरूरत है, बल्कि उन्हें समाज में सम्मान और समावेश मिलना भी बेहद जरूरी है।
उन्होंने बाल रोग विशेषज्ञों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम सुनिश्चित करें कि ये बच्चे स्वस्थ वयस्कों के रूप में विकसित हों, ताकि देश पर अस्वस्थ आबादी का बोझ न बढ़े। उन्होंने रेजिडेंट डॉक्टरों को विभाग की रीढ़ बताया और प्रो. सरोज मेहता की विरासत को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
समय पर पहचान ही बचाव का एकमात्र रास्ता: प्रो. आर.के. रठो
सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे पीजीआई के डीन (अकादमिक) प्रो. आर.के. रठो ने विभाग के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि जब डॉक्टर अपनी ड्यूटी से आगे बढ़कर मरीजों की सेवा करते हैं, तो वह काम जुनून बन जाता है। बच्चों के लिवर रोगों, विशेषकर 'बिलीरी एट्रेसिया' (Biliary Atresia) जैसी बीमारियों में समय पर पहचान और सही रेफरल सबसे बड़ी चुनौती है।
प्रो. रठो ने मानवीय संवेदनाओं को जोड़ते हुए कहा, "बच्चे केवल मरीज नहीं हैं, वे हमारी आशा के दूत (Ambassadors of Hope) हैं। उनकी रिकवरी और खुशहाली ही हमारी मेहनत की सफलता को परिभाषित करती है।"
उम्मीद की किरण बने ये नन्हे 'एंबेसेडर'
सम्मेलन का सबसे भावुक क्षण वह था जब उन बच्चों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने गंभीर लिवर बीमारियों को मात दी है। इनमें सफल लिवर ट्रांसप्लांट करा चुकी 6 साल की बच्ची 'एन', सफल कसाई प्रक्रिया (Kasai procedure) से गुजरी 9 साल की 'ए.ए.', और दुर्लभ लिवर रोगों (PFIC) के बावजूद सामान्य जीवन जी रहे मास्टर 'वी' और 'एस.एन.' शामिल थे। ये बच्चे चिकित्सा विज्ञान की सफलता और समय पर इलाज के जीवंत उदाहरण बनकर उभरे।
दो दिवसीय कार्यक्रम में भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा
कॉन्फ्रेंस के पहले दिन 'बिलीरी एट्रेसिया' के परिणामों को बेहतर बनाने, शुरुआती निदान और सर्जिकल तकनीकों पर चर्चा की गई। दूसरे दिन जेनेटिक और मेटाबॉलिक लिवर विकारों के साथ-साथ उभरती हुई नई चिकित्सा पद्धतियों पर विशेषज्ञ अपनी राय रखेंगे।
इस उद्घाटन सत्र में प्रो. निर्मला डी (चेन्नई), प्रो. सुरिंदर राणा सहित कई वरिष्ठ डॉक्टर मौजूद रहे। कार्यक्रम का समापन प्रो. सुरिंदर राणा के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ। यह सम्मेलन पीजीआई की उस प्रतिबद्धता को दोहराता है, जहां हर बच्चे की मुस्कान चिकित्सा जगत को नए शोध और समर्पण के लिए प्रेरित करती है।

