Knowledge Journey : जापान के आंगन में महकी भारतीय दर्शन की सुगंध, प्रो. सिन्हा की 'ज्ञान-यात्रा' का नौवां पड़ाव सफल
सात समंदर पार 'मनीषी' की गूंज : टोक्यो और ओसाका में जुटी विद्वानों की टोली, जापानी कलाकारों ने रवींद्र संगीत से बांधा समां
Knowledge Journey : भारत की आध्यात्मिक विरासत और दार्शनिक सोच जब तकनीकी प्रधान देश जापान की गलियों में गूंजी, तो नजारा देखने लायक था। 'ब्रह्मलीन युग मनीषी' प्रोफेसर हिम्मत सिंह सिन्हा की याद में शुरू हुई 'ज्ञान-यात्रा' अपने नौवें पड़ाव पर जापान पहुंची। लोटस ब्लूम पब्लिकेशन के इस अभियान ने भारत से शुरू होकर यूएई, बहरीन, कतर, ओमान, मॉरीशस, सिंगापुर और मलेशिया की यात्रा पूरी करने के बाद अब उगते सूर्य के देश में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। 11 अप्रैल को टोक्यो के एदोगावा कल्चरल सेंटर और 12 अप्रैल को ओसाका के उत्सव मंच पर इस यात्रा के विशेष कार्यक्रम आयोजित किए गए।
दार्शनिक विरासत को सहेजने के लिए 'फाउंडेशन' का आगाज
इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि जापान की धरती पर 'प्रोफेसर हिम्मत सिंह सिन्हा फाउंडेशन' की स्थापना रही। इस फाउंडेशन की जिम्मेदारी भारत से डॉ. जय भगवान सिंगला, दुबई से के.बी. व्यास, टोक्यो से पूर्व विधायक योगेंद्र पौराणिक और लेक्चरर शांतनु लश्कर को सौंपी गई है।
कुरुक्षेत्र से विशेष रूप से पहुंचे प्रेरणा वृद्धाश्रम के संस्थापक डॉ. जय भगवान सिंगला ने अपनी 43 वर्षों की स्मृतियों को साझा करते हुए बताया कि प्रोफेसर सिन्हा केवल एक विद्वान नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक थे। डॉ. सिंगला, जो खुद एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद् और उद्योगपति हैं, ने बताया कि प्रो. सिन्हा से उनकी साप्ताहिक मुलाकातों ने उनके जीवन के प्रति नजरिए को बदल दिया।
जब जापानी सुरों में घुला भारतीय रवींद्र संगीत![]()
सांस्कृतिक मेलजोल का अनूठा उदाहरण तब देखने को मिला जब श्रीमती त्सुत्सुई सेंसेई के नेतृत्व में पांच जापानी कलाकारों ने रवींद्र संगीत की प्रस्तुति दी। उनकी सधी हुई आवाज और भारतीय संगीत के प्रति समर्पण ने हॉल में मौजूद हर शख्स को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम में एक ऐसी शख्सियत मौजूद थी जिनका इतिहास सीधा आजाद हिंद फौज से जुड़ा है। पद्मश्री तोमिओ मिज़ोकामि, जिन्हें बचपन में स्वयं नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनी गोद में लिया था, इस आयोजन के मुख्य आकर्षण रहे। प्रधानमंत्री मोदी के करीबी और ओसाका विश्वविद्यालय में हिंदी के पूर्व प्रोफेसर मिज़ोकामि ने प्रो. सिन्हा के योगदान को वैश्विक साहित्य के लिए अमूल्य बताया।
दर्शन की उलझन सुलझाने वाला 'डिजिटल ज्ञान'
कार्यक्रम में नलिनी योशनिवाल ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे प्रोफेसर सिन्हा के वीडियो ने उनकी दार्शनिक जिज्ञासाओं को शांत किया। उन्होंने कहा कि भारतीय और पाश्चात्य दर्शन के बीच के अंतर को प्रो. सिन्हा ने इतनी सरलता से समझाया है कि कोई भी आम व्यक्ति उसे आत्मसात कर सकता है।
कार्यक्रम के सफल आयोजन में ओसाका विश्वविद्यालय की डॉ. तोमोका मुशिगा, उत्सव मंच के अध्यक्ष कुमार अभिजीत और डॉ. राजीव कुमार वर्मा की अहम भूमिका रही। इस दौरान श्रीमती मीनाक्षी गोयल नायर, दीनदयाल सनोडिया और आदित्य ने भी अपने वक्तव्यों और कविताओं के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित की। पूरे कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. वेदप्रकाश सिंह ने किया, जिसमें ओसाका और कोबे के भारतीय समुदाय ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

