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IMA ने फूंका स्वास्थ्य सुधार का बिगुल : सरकार से GDP का 5% स्वास्थ्य पर खर्च करने की मांग

IMA देश की सबसे बड़ी डॉक्टर संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की अकादमिक शाखा आईएमए एकेडमी ऑफ मेडिकल स्पेशियलिटीज (IMA AMS) ने अपने वार्षिक सम्मेलन एएमएसकॉन में स्पष्ट संदेश दिया है कि भारत को अब ‘इलाज आधारित’ नहीं बल्कि ‘रोकथाम...
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IMA देश की सबसे बड़ी डॉक्टर संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की अकादमिक शाखा आईएमए एकेडमी ऑफ मेडिकल स्पेशियलिटीज (IMA AMS) ने अपने वार्षिक सम्मेलन एएमएसकॉन में स्पष्ट संदेश दिया है कि भारत को अब ‘इलाज आधारित’ नहीं बल्कि ‘रोकथाम आधारित’ स्वास्थ्य नीति की ओर बढ़ना होगा। संगठन ने सरकार से स्वास्थ्य बजट बढ़ाकर GDP का कम से कम 5 प्रतिशत करने, डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और चिकित्सा शिक्षा में सुधार के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है।

करीब 19 हजार विशेषज्ञ डॉक्टरों की सदस्यता वाली यह शाखा पूरे वर्ष देशभर में मेडिकल एजुकेशन, वर्कशॉप, पैनल चर्चा और फेलोशिप कार्यक्रमों का संचालन करती है। इसकी वार्षिक पत्रिका Annals का इस वर्ष का विषय एडल्ट वैक्सीनेशन, विशेषकर एचपीवी वैक्सीनेशन पर केंद्रित है।

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राष्ट्रीय अभियानों पर जोर

संस्थान ने पोलियो उन्मूलन, टीबी नियंत्रण, कोविड-19 प्रतिक्रिया और नागरिकों को सीपीआर प्रशिक्षण जैसे अभियानों को अपनी प्रमुख राष्ट्रीय पहल बताया। इसका फ्लैगशिप कार्यक्रम ‘आओ गांव चलें’ अब भी देशभर के गांवों और शहरी मलिन बस्तियों में स्वास्थ्य सेवाएं और जागरूकता फैला रहा है।

आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. दिलीप भनुशाली ने कहा, ‘आईएमए हमेशा से सार्वजनिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर अग्रणी रहा है। नागरिकों के लिए CPR और HPV वैक्सीनेशन ट्रेनिंग से असंख्य जीवन बचाए जाएंगे। हम सरकार से आग्रह करते हैं कि स्वास्थ्य बजट को GDP का कम से कम 5 प्रतिशत किया जाए, ताकि स्वास्थ्य ढांचा मजबूत हो और आम नागरिकों की जेब से होने वाला खर्च घटे।’ उन्होंने स्वास्थ्य बीमा और जीवनरक्षक दवाओं पर जीएसटी हटाने के निर्णय का स्वागत किया।

मिश्रित चिकित्सा पद्धति पर चिंता

आईएमए ने मिक्सोपैथी यानी विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के अवैज्ञानिक मिश्रण पर गंभीर चिंता जताई। तत्काल पूर्व अध्यक्ष डॉ. आर. वी. असोकन ने कहा, ‘हर चिकित्सा पद्धति का अपना वैज्ञानिक ढांचा होता है, लेकिन अवैज्ञानिक एकीकरण मरीजों की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है। JIPMER का प्रस्तावित इंटीग्रेटेड MBBS-BAMS कोर्स इसी दिशा में गलत कदम है।’

उन्होंने NEET परीक्षा में सुधार, बांड प्रणाली समाप्त करने और युवा डॉक्टरों की कार्य परिस्थितियों को बेहतर करने की भी मांग की।

डॉक्टरों की सुरक्षा और कानूनी सुधार

स्वास्थ्यकर्मियों पर बढ़ती हिंसा को रोकने के लिए आईएमए ने सख्त केंद्रीय कानून की मांग दोहराई।

डॉ. भनुशाली ने कहा, ‘क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट छोटे अस्पतालों पर अनावश्यक बोझ डालता है। 50 बेड से कम वाले अस्पतालों को इससे मुक्त किया जाए। साथ ही, चिकित्सा पेशे को कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट से बाहर रखा जाए और एक अलग मेडिकल मालप्रैक्टिस एक्ट बनाया जाए, जिसमें क्षतिपूर्ति की सीमा तय हो।’

नीति निर्माण में आईएमए की भूमिका आवश्यक

करीब चार लाख सदस्यों वाले आईएमए ने कहा कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों के निर्माण में उसकी भागीदारी अनिवार्य होनी चाहिए। डॉ. भनुशाली ने कहा, ‘आईएमए सरकार और जनप्रतिनिधियों के साथ रचनात्मक संवाद के लिए तैयार है। हमारा उद्देश्य जनता के स्वास्थ्य, डॉक्टरों की गरिमा और सुरक्षा की रक्षा करना है।’

शिक्षा और शोध को नई दिशा

आईएमए एएमएस के राष्ट्रीय चेयरमैन डॉ. रमनिक बेदी ने कहा, ‘हमारा लक्ष्य मेडिकल शिक्षा को सशक्त बनाना और विशेषज्ञ डॉक्टरों को वैश्विक स्तर का कौशल प्रदान करना है। Annals में एडल्ट वैक्सीनेशन पर केंद्रित थीम हमारी वैज्ञानिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। AMSCON देशभर के डॉक्टरों के लिए एक उत्कृष्ट अकादमिक मंच बन चुका है।’

 

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