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हाईकोर्ट से हुड्डा को बड़ी राहत: एजेएल प्लॉट केस में चार्जशीट रद्द

अदालत ने कहा- रिकॉर्ड में प्रथम दृष्टया अपराध का आधार नहीं; सीबीआई को झटका पंचकूला एजेएल प्लॉट पुनः आवंटन मामले में बड़ा कानूनी मोड़ आया है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और एसोसिएटेड जर्नल्स...

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अदालत ने कहा- रिकॉर्ड में प्रथम दृष्टया अपराध का आधार नहीं; सीबीआई को झटका

पंचकूला एजेएल प्लॉट पुनः आवंटन मामले में बड़ा कानूनी मोड़ आया है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) के खिलाफ दायर सीबीआई की चार्जशीट को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड में प्रथम दृष्टया किसी आपराधिक कृत्य की पुष्टि नहीं होती।

न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया की पीठ ने 16 अप्रैल 2021 को विशेष सीबीआई अदालत, पंचकूला द्वारा आरोप तय करने और डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने के आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही मामले में आगे की सभी कार्यवाहियां स्वतः समाप्त हो गईं। हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत सामग्री में कथित अपराध के आवश्यक तत्वों का अभाव है।

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यह मामला वर्ष 2005 में पंचकूला में एजेएल को भूखंड के दोबारा आवंटन से जुड़ा है। दिसंबर 2018 में सीबीआई ने आरोपपत्र दाखिल करते हुए आरोप लगाया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में हुड्डा ने एजेएल को अवैध लाभ पहुंचाया। विशेष अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी और 420 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत आरोप तय किए थे।

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हाईकोर्ट ने कहा कि हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (तत्कालीन हुडा) द्वारा लिया गया निर्णय एक नीतिगत और प्रशासनिक फैसला था, जिसे प्राधिकरण के अन्य सदस्यों ने भी अनुमोदित किया था। बाद में दिए गए बयानों के आधार पर उस निर्णय को फर्जी या महत्वहीन करार देना उचित नहीं है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनः आवंटन को अब तक किसी सक्षम अदालत ने अवैध घोषित नहीं किया है। कोर्ट ने जांच की निष्पक्षता पर भी टिप्पणी की। यदि निर्णय सामूहिक था, तो केवल अध्यक्ष के रूप में हुड्डा को आरोपी बनाना और अन्य सदस्यों को नजरअंदाज करना जांच की निष्पक्षता पर प्रश्न खड़ा करता है।

सीबीआई के इस तर्क को भी अदालत ने खारिज किया कि पुनः आवंटन से प्राधिकरण को अधिक राजस्व मिल सकता था। कोर्ट ने कहा कि ‘संभावित आमदनी’ के आधार पर आपराधिक दायित्व स्थापित नहीं किया जा सकता, जब तक वास्तविक हानि और आपराधिक मंशा का स्पष्ट प्रमाण न हो।

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