High Court Verdict : हत्या के मामले में किशोर को आजीवन जेल में रखने पर हाईकोर्ट की रोक
अदालत ने कहा-भले ही वयस्क की तरह चले मुकदमा, पर किशोर की रिहाई की उम्मीद खत्म नहीं की जा सकती
High Court Verdict : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि हत्या जैसे गंभीर मामले में भी किशोर को जीवन भर जेल में नहीं रखा जा सकता। भले ही उस पर एक वयस्क की तरह मुकदमा चला हो। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सजा सुनाते समय किशोर की रिहाई की उम्मीद हमेशा बची रहनी चाहिए।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने एक मामले में निचली अदालत द्वारा दी गई 10 साल की सजा को अवैध मानकर रद्द कर दिया है। जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने भिवानी के 2022 के एक हत्या मामले में यह फैसला सुनाया। इस मामले में दोषी किशोर ने हाईकोर्ट में अपील की थी। आरोपी पर किशोर न्याय अधिनियम 2015 के तहत एक वयस्क की तरह मुकदमा चलाया गया था। निचली अदालत ने उसे धारा 302 और 506 के तहत दोषी मानते हुए हत्या के लिए 10 साल और आपराधिक धमकी के लिए छह महीने की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने इस सजा को गलत माना और शुरुआत में ही मामले में हस्तक्षेप किया।
धारा 302 में 10 साल की सजा का नियम नहीं
हाईकोर्ट ने 10 साल की सजा को गलत बताते हुए कहा कि आईपीसी की धारा 302 के तहत केवल दो ही सजा दी जा सकती हैं। ये हैं मौत की सजा या उम्रकैद। कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है कि धारा 302 के तहत 10 साल की सजा दी जाए। अदालत ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 19 और 21 का भी जिक्र किया। अदालत ने कहा कि धारा 21 किसी भी किशोर को मौत की सजा या बिना रिहाई की उम्मीद के उम्रकैद देने से रोकती है। यदि किसी को फांसी की सजा दी जाती है, तो उसकी रिहाई की कोई उम्मीद नहीं बचती। इसलिए, किशोर को फांसी की सजा बिल्कुल नहीं दी जा सकती।

