GMCH-32 Chandigarh : भेदभाव मिटाकर ही होगा उपचार, LGBTQIA+ समुदाय की मानसिक चुनौतियों पर विशेषज्ञों का संवाद
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-2 के तहत समावेशी स्वास्थ्य प्रणाली पर विशेषज्ञों ने दिया जोर; सामाजिक कलंक और उपेक्षा को बताया उपचार में बड़ी बाधा
GMCH-32 Chandigarh : सेहत का अर्थ केवल शारीरिक तंदुरुस्ती नहीं, बल्कि मानसिक खुशहाली भी है। लेकिन समाज का एक बड़ा वर्ग अपनी पहचान और मानसिक परेशानियों पर बात करने से आज भी हिचकिचाता है। इसी खामोशी को तोड़ने के लिए शनिवार को राजकीय मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (जीएमसीएच), सेक्टर-32 के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग ने एक विशेष पहल की। सेक्टर-35 स्थित आईएमए हॉल में 'राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-2' (NMHS-2) के तहत 'ब्रिजिंग गैप्स इन मेंटल हेल्थ: एलजीबीटीक्यूआईए+ संवाद' कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य लैंगिक अल्पसंख्यकों के लिए एक समावेशी और सुरक्षित स्वास्थ्य प्रणाली तैयार करना था।
विभाग की एचओडी और मुख्य अन्वेषक डॉ. सोनिया पुरी ने संवाद की शुरुआत करते हुए कहा कि हाशिए पर रहने वाले समुदायों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होना ही स्वास्थ्य सेवाओं के अंतर को पाटने की दिशा में पहला कदम है। उन्होंने सुरक्षित और सहायक वातावरण तैयार करने पर विशेष जोर दिया।
कलंक और भेदभाव उपचार में सबसे बड़ी रुकावट
जीएमसीएच-32 की डायरेक्टर प्रिंसिपल डॉ. रवनीत कौर ने अपने संदेश में भरोसा दिलाया कि संस्थान हर व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करता है। उन्होंने कहा, "स्वास्थ्य प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जहाँ हर व्यक्ति, चाहे उसकी पहचान कुछ भी हो, इलाज के दौरान सम्मानित महसूस करे।"
वहीं, सह-मुख्य अन्वेषक डॉ. दिनेश वालिया ने 'ब्रेकिंग द साइलेंस' विषय पर बोलते हुए कहा कि सामाजिक कलंक (Stigma) और भेदभाव आज भी इलाज की राह में सबसे बड़ी दीवार हैं। उन्होंने स्वास्थ्य पेशेवरों से अपील की कि वे पूर्वाग्रहों को छोड़कर सहानुभूति के साथ मरीजों का उपचार करें। इसी क्रम में डॉ. अभिनव अग्रवाल ने युवाओं में पहचान और स्वीकृति से जुड़े मानसिक तनाव पर जानकारी दी और समय पर परामर्श की महत्ता बताई।
जमीनी सच्चाई : जब तक समाज नहीं अपनाएगा, खामोशी नहीं टूटेगी
इस संवाद में न केवल डॉक्टरों ने, बल्कि समुदाय के प्रतिनिधियों ने भी खुलकर अपनी बात रखी। 'सक्षम प्रकृति सेवा सोसाइटी' के धनंजय ने उन चुनौतियों को साझा किया जिनका सामना इस समुदाय के लोग हर रोज करते हैं। उन्होंने बताया कि परिवार की ओर से स्वीकार न किए जाने और सुरक्षित स्थानों (Safe Spaces) की कमी के कारण मानसिक तनाव गहराता जा रहा है।
चर्चा के दौरान यह बात उभरकर आई कि 'पीयर सपोर्ट' (आपसी सहयोग) और गोपनीय परामर्श सेवाएँ इस दिशा में गेम-चेंजर साबित हो सकती हैं। कार्यशाला में डॉ. प्रीति अरुण, डॉ. अपराजिता सहित खनक फाउंडेशन और केशव सूरी फाउंडेशन के विशेषज्ञों ने भी अहम सुझाव दिए। उम्मीद है कि इस संवाद से प्राप्त निष्कर्ष चंडीगढ़ में चल रहे राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-2 की सफलता और भविष्य की स्वास्थ्य नीतियों को बेहतर बनाने में मददगार साबित होंगे।

