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बच्चों को बेवजह न दें एंटीबायोटिक, बढ़ सकता है गंभीर रोगों का खतरा!

पीजीआई के ‘पीडियाट्रिक्स अपडेट-2026’ में गंभीर रोगों पर मंथन

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पीजीआई में बाल रोग चिकित्सा के आधुनिक नवाचारों पर मंथन के दौरान मौजूद देश के जाने-माने विशेषज्ञ। -ट्रिब्यून फोटो
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बच्चों के उपचार में बिना सोचे-समझे एंटीबायोटिक दवाओं का प्रयोग भविष्य के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। दवाओं के प्रति बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता आज चिकित्सा जगत के लिए एक वैश्विक चुनौती है। पीजीआई के बाल रोग विभाग की ओर से आयोजित दो दिवसीय ‘पीडियाट्रिक्स अपडेट-2026’ के समापन अवसर पर विशेषज्ञों ने इस गंभीर मुद्दे पर विशेष चर्चा की। ‘बेसिक्स टू ब्रेकथ्रू’ विषय पर आधारित इस सम्मेलन में देशभर से आए बाल रोग विशेषज्ञों ने आधुनिक उपचार और नई तकनीक पर अपने अनुभव साझा किए। सम्मेलन के दूसरे दिन आयोजित विशेष पैनल चर्चा में विशेषज्ञों ने आगाह किया कि बच्चों को अनावश्यक रूप से भारी (ब्रॉड-स्पेक्ट्रम) एंटीबायोटिक देने से बचना चाहिए। अब डॉक्टरों को स्थानीय स्तर पर मौजूद बैक्टीरिया की प्रकृति को ध्यान में रखकर ही सटीक दवा देनी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं के बेअसर होने के खतरे को कम करने के लिए उपचार के वैज्ञानिक सिद्धांतों को अपनाना अब समय की मांग है।

दुर्लभ बीमारियों के लिए ‘आर्थिक कवच’

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सम्मेलन के दौरान ‘दुर्लभ बीमारियों के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम’ पर विस्तार से जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बताया कि ऐसी बीमारियों से पीड़ित बच्चों की पहचान करना और उन्हें सरकारी वित्तीय सहायता के साथ जोड़ना अब आसान होगा। बाल रोग विशेषज्ञों को उन रास्तों के बारे में जागरूक किया गया, जिनके जरिए पीड़ित परिवारों को इलाज के लिए जरूरी आर्थिक मदद और सामाजिक संसाधन मिल सकते हैं।

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जांच में सटीकता और आधुनिक उपचार

अकादमिक सत्रों में नवजात शिशुओं में दिमागी बुखार की शीघ्र पहचान और मूत्र मार्ग संक्रमण के प्रबंधन पर चर्चा की गई। छाती के एक्स-रे की सटीक व्याख्या पर जोर देते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि सही पैटर्न की पहचान से बच्चों को अनावश्यक टेस्ट और गलत इलाज से बचाया जा सकता है। इसके अलावा, आनुवंशिक विकास और जीन थेरेपी जैसे विषयों ने भविष्य की चिकित्सा पद्धति की राह दिखाई। विशेषज्ञों ने ‘नेक्स्ट-जेनरेशन सीक्वेंसिंग’ के जरिए व्यक्तिगत स्तर पर सटीक उपचार की संभावनाओं को भी टटोला।

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