Border-2 की रिलीज के बीच ‘Border’ फिल्म पर फिर उठा विवाद, लोंगेवाला के जंग के दिग्गजों ने गलत प्रस्तुति पर जताई आपत्ति
19 साल की उम्र में युद्ध, 74 की उम्र में भी सवाल
Border Longewala Dispute : हाल ही में रिलीज़ हुई बॉलीवुड फिल्म ‘Border-2’ देशभर में चर्चा में है, लेकिन इसके साथ ही वर्ष 1997 में आई सुपरहिट फिल्म ‘Border’ से जुड़ा एक पुराना विवाद फिर सामने आ गया है। 1971 के भारत–पाक युद्ध के दौरान लड़े गए ऐतिहासिक लोंगेवाला युद्ध में शामिल रहे कुछ सैनिकों ने फिल्म में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किए जाने पर आपत्ति जताई है और अपने योगदान को सही तरीके से मान्यता देने की मांग की है।
लोंगेवाला की लड़ाई में शामिल रहे नायक जगदेव सिंह, जो फिरोजपुर के रहने वाले हैं, ने कहा कि फिल्म ‘Border’ में उन्हें और उनके साथियों को शहीद दिखाया गया, जबकि हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। “फिल्म में हमें मृत दिखा दिया गया, जबकि उस लड़ाई में हमारी कंपनी को केवल तीन हताहत हुए थे। लेकिन आज तक किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि जिन सैनिकों को फिल्म में शहीद बताया गया, वे वास्तव में कहां हैं और किस हालत में हैं,” उन्होंने कहा।
19 साल की उम्र में युद्ध, 74 की उम्र में भी सवाल
जगदेव सिंह ने बताया कि वह 1971 में मात्र 19 वर्ष की उम्र में सेना में भर्ती हुए थे और केवल साढ़े चार महीने की ट्रेनिंग के बाद 23 पंजाब रेजिमेंट के साथ युद्ध में उतर गए। 17 साल की सेवा के बाद उन्होंने पारिवारिक कारणों से सेना छोड़ी और बाद में बैंक में नौकरी की। उनका कहना है कि लोंगेवाला पोस्ट पर तैनात उनकी कंपनी में 100 से भी कम जवान थे, जिन्होंने टैंकों से लैस पाकिस्तानी सेना के बड़े हमले को रोका। इस दौरान भारतीय वायुसेना की भूमिका निर्णायक रही।
“हम सच्ची कहानी अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चाहते हैं”
जगदेव सिंह ने कहा कि लोंगेवाला युद्ध में शामिल करीब 20 सैनिक ही अब जीवित बचे हैं और उनमें से कुछ को 9 फरवरी को चंडीगढ़ में एक निजी संस्था द्वारा सम्मानित किया जा रहा है। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी को युद्ध की असली कहानी पता चले, ताकि वे सैनिकों के साहस से प्रेरित हों। फिल्म की गलत कहानी के कारण लोग मज़ाक में हमें ‘मरे हुए और भुला दिए गए सैनिक’ कहते हैं”। इस मुद्दे को लेकर पूर्व सैनिकों ने राजस्थान और पंजाब के राज्यपालों समेत वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखकर अपनी आपत्ति और मांगें दर्ज कराई हैं।
फिल्म और हकीकत के बीच अंतर
वहीं, कुछ अन्य सैन्य विशेषज्ञों और पूर्व सैनिकों का मानना है कि व्यावसायिक फिल्मों में दर्शकों को आकर्षित करने के लिए घटनाओं का नाटकीय रूपांतरण किया जाता है, जिससे कुछ तकनीकी और तथ्यात्मक त्रुटियां रह जाती हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में कई फिल्म निर्माता अब सैन्य पृष्ठभूमि की फिल्मों के लिए रिटायर्ड अधिकारियों को सलाहकार के रूप में जोड़ रहे हैं।
लोंगेवाला युद्ध: साहस की मिसाल
लोंगेवाला की लड़ाई 5–6 दिसंबर 1971 को राजस्थान के जैसलमेर सेक्टर में लड़ी गई थी। यह पश्चिमी मोर्चे पर भारत–पाक युद्ध की पहली बड़ी झड़पों में से एक थी। इस लड़ाई में 23 पंजाब रेजिमेंट के करीब 70 जवानों ने 2,800 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों और 65 टैंकों से लैस दुश्मन ब्रिगेड को रोक दिया था।
इस कंपनी का नेतृत्व कर रहे ब्रिगेडियर (तत्कालीन मेजर) के.एस. चांदपुरी, जिन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था, ने पहले बताया था कि जवानों को या तो मोर्चा संभालने या रणनीतिक पीछे हटने का विकल्प दिया गया था, लेकिन उन्होंने डटे रहने का फैसला किया। वायुसेना के हस्तक्षेप के बाद युद्ध का रुख पूरी तरह बदल गया और अंत में 22 पाकिस्तानी टैंक तबाह कर दिए गए। ब्रिगेडियर चांदपुरी का वर्ष 2018 में निधन हो गया था।
Border-2 और पुरानी यादें
जनवरी में रिलीज़ हुई ‘Border-2’ में 1971 के युद्ध के दौरान सेना, वायुसेना और नौसेना की कई मोर्चों पर हुई कार्रवाइयों को दिखाया गया है, जबकि पहली ‘Border’ फिल्म केवल लोंगेवाला युद्ध पर आधारित थी लेकिन इसके साथ ही यह विवाद एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर रहा है कि इतिहास और सिनेमा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

