Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

छपे हुए शब्दों की ताकत

70 वर्ष की उम्र में पहुंचकर मैं शांति और गर्व के साथ कह सकता हूं कि मैं द ट्रिब्यून के पाठकों के तीसरी पीढ़ी के परिवार से आता हूं और पिछले चार दशकों से इससे जुड़ा पहला लेखक भी हूं।...

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

70 वर्ष की उम्र में पहुंचकर मैं शांति और गर्व के साथ कह सकता हूं कि मैं द ट्रिब्यून के पाठकों के तीसरी पीढ़ी के परिवार से आता हूं और पिछले चार दशकों से इससे जुड़ा पहला लेखक भी हूं। हमारे लिए यह सिर्फ़ एक अख़बार नहीं रहा, बल्कि एक संस्था, सोचने की आदत और सार्वजनिक जीवन को समझने का नैतिक मार्गदर्शक रहा है।

द ट्रिब्यून से मेरा परिचय बचपन में ही, अपने पिता के माध्यम से हुआ। वे अक्सर पुराने पाठकों की एक कहावत दोहराते थे “बात वही जो छपे ट्रिब्यून में।” यानी द ट्रिब्यून में छपी बात पर भरोसा किया जाता था। वे प्रेम भाटिया के दौर का बड़े सम्मान से ज़िक्र करते थे, जब ज़रा-सी तथ्यात्मक गलती पर भी कड़ी आलोचना होती थी। भाटिया पुराने दौर के पत्रकार थे प्रचार से दूर, सिर्फ़ अपनी संपादकीय अंतरात्मा के प्रति जवाबदेह। उन्हें लोग बस “ट्रिब्यून मैन” कहते थे।

Advertisement

इससे प्रभावित होकर मैंने संपादक के नाम पत्र लिखने शुरू किए, जिनमें से कई प्रकाशित भी हुए। धीरे-धीरे मैं नियमित लेखक बन गया। द ट्रिब्यून की पहुंच इतनी व्यापक थी कि बरगद के पेड़ के नीचे बैठे किसान भी इसके कॉलम पढ़कर राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करते थे।

Advertisement

मेरे छोटे से कस्बे सफीदों (ज़िला जींद) में द ट्रिब्यून के सिर्फ दो ग्राहक थे मेरे पिता और डॉक्टर चैन सिंह। आज भी याद है, रेलवे स्टेशन तक दौड़कर अख़बार लेना, जो कभी-कभी दो-तीन दिन देर से पहुंचता था, लेकिन फिर भी बेसब्री से इंतजार रहता था। एक बार तो मैं अपने मास्टर डिग्री के परीक्षा परिणाम देखने के लिए भी द ट्रिब्यून का ही सहारा लिया था, क्योंकि उस समय वही एक भरोसेमंद स्रोत था।

द ट्रिब्यून हमेशा से एक गंभीर और सधा हुआ अख़बार रहा है। इसने सनसनीख़ेज़ खबरों से दूरी बनाए रखी। बड़े से बड़े घटनाक्रम भी संतुलन, संयम और ज़िम्मेदारी के साथ प्रकाशित किए गए। इसने स्थानीय प्रतिभाओं को आगे बढ़ाया और क्षेत्र से गहराई से जुड़ा रहा। किसानों के आंदोलन सहित जनहित के बड़े मुद्दों पर यह मजबूती से खड़ा रहा। अपने सामाजिक दायरे में यह कहा जाना कि किसी की रचना द ट्रिब्यून में छपी है, आज भी गर्व की बात मानी जाती है।

— लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं

Advertisement
×