वह अख़बार जिसने मुझे दुनिया से जोड़ा
पंजाबी मासिक 'प्रीत लड़ी' और अंग्रेजी दैनिक 'द ट्रिब्यून' ने मेरे जीवन के शुरुआती दौर में मेरे बौद्धिक विकास को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मैंने फिरोजपुर शहर में स्कूल जाते समय 14 साल की उम्र में 'द ट्रिब्यून'...
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पंजाबी मासिक 'प्रीत लड़ी' और अंग्रेजी दैनिक 'द ट्रिब्यून' ने मेरे जीवन के शुरुआती दौर में मेरे बौद्धिक विकास को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मैंने फिरोजपुर शहर में स्कूल जाते समय 14 साल की उम्र में 'द ट्रिब्यून' पढ़ना शुरू किया। उस अनुभव का उल्लेख मैंने अपनी पुस्तक 'इकोनॉमी, कल्चर एंड ह्यूमन राइट्स : टर्बुलेंस इन पंजाब, इंडिया एंड बियॉन्ड' (2010) के एक अध्याय में किया है : 'मैंने द ट्रिब्यून पढ़ना शुरू किया, जो तब और अब भी पंजाब में सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अंग्रेजी समाचार पत्र है।
इसने मुझे उस दुनिया से जोड़ने में मदद की जो तुरंत धार्मिक प्रतीकों और संकेतकों को सामने नहीं लाती। व्यापक अर्थों में, इसने मेरे विश्वदृष्टिकोण को अधिक धर्मनिरपेक्ष बनाने में सकारात्मक योगदान दिया।'
'द ट्रिब्यून' के साथ मेरा सबसे महत्वपूर्ण जुड़ाव 1981 में शुरू हुआ, जब मैं पंजाब विश्वविद्यालय के इकोनॉमिक्स डिपार्टमेंट में पढ़ा रहा था। उस समय के समीक्षा संपादक श्री रामास्वामी, पंजाबी ट्रिब्यून के हरभजन हलवारवी के साथ, मुझसे अमर्त्य सेन की पुस्तक 'पावर्टी एंड फैमिन्स' की समीक्षा लिखने का अनुरोध करने आए।
मैंने अपनी प्रकाशित समीक्षा की एक प्रति अमर्त्य सेन को भेजी। उन्होंने मुझे उत्तर लिखकर धन्यवाद दिया और इस बात की सराहना की कि मैंने उनके इस निष्कर्ष को रेखांकित किया था कि दुनिया में अकाल इसलिए नहीं पड़ते कि भोजन की कमी होती है, बल्कि इसलिए कि कुछ लोग मौजूदा कीमतों पर आवश्यक भोजन खरीदने के लिए बहुत गरीब होते हैं। उन्होंने उदारतापूर्वक मेरी इस आलोचना को भी स्वीकार किया कि उनके विश्लेषण में अकाल के लैंगिक आयाम की कमी थी। इसके बाद उन्होंने अपने दो बाद के लेखों की प्रतियां मुझे भेजीं, जिनमें लैंगिक आयाम को शामिल किया गया था। जब मैं 1980 के दशक के आखिर में उनसे ऑक्सफोर्ड में मिला, तो उन्हें मेरी वह समीक्षा याद थी।
द ट्रिब्यून, पंजाबी ट्रिब्यून और कभी-कभी दैनिक ट्रिब्यून के साथ मेरा व्यापक जुड़ाव 2009 में शुरू हुआ, जब दिवंगत प्रोफेसर अमरीक सिंह ने स्नेहपूर्ण, लेकिन वरिष्ठता भरे अंदाज में मुझे समझाया कि सिर्फ ऑक्सफोर्ड के आइवरी टावर तक सीमित रहना ठीक नहीं है और मुझे द ट्रिब्यून के लिए यथासंभव नियमित रूप से लिखना चाहिए। मैंने तुरंत वैश्विक पर्यावरणीय चुनौती पर लेख लिखकर प्रतिक्रिया दी और तब से लगातार योगदान देता आ रहा हूं।
— लेखक ऑक्सफोर्ड ब्रूक्स यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं
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