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संघर्षों से गढ़ा गया

मुझसे एक बार पूछा गया था कि क्या ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की शुरुआत की कोई तारीख तय की जा सकती है। मेरा उत्तर था “इसकी दो तारीखें हैं। पहली, जब ब्रिटिश सत्ता ने खुद को एक ‘साम्राज्य’ के रूप...

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मुझसे एक बार पूछा गया था कि क्या ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की शुरुआत की कोई तारीख तय की जा सकती है। मेरा उत्तर था “इसकी दो तारीखें हैं। पहली, जब ब्रिटिश सत्ता ने खुद को एक ‘साम्राज्य’ के रूप में देखना शुरू किया। दूसरी, 13 अप्रैल 1919 को हुआ जलियांवाला बाग हत्याकांड।” उस खून से सने दिन और उससे पहले व बाद की घटनाओं ने ब्रिटिश राज की असली सच्चाई को उजागर कर दिया।

साम्राज्य के अंत की प्रक्रिया भारत से शुरू हुई और कुछ ही दशकों में पूरी दुनिया में फैल गई। जिस सत्ता ने हजार साल तक टिके रहने का सपना देखा था, वह समाप्त हो गई। 1919 की शुरुआत में ही द ट्रिब्यून ने अपने निडर संपादक कालीनाथ राय के नेतृत्व में पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर की दमनकारी नीतियों के खिलाफ तीखे संपादकीय लिखे।

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राजद्रोह के आरोप में कालीनाथ राय को जेल भेज दिया गया। उसी वर्ष सरकार के आदेश पर मई से जुलाई तक अख़बार का प्रकाशन बंद रहा। स्वतंत्रता आंदोलन की बड़ी धारा में ये घटनाएं भले ही छोटी लगें, लेकिन उनका महत्व बहुत गहरा था। यह एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी अख़बार था, जिसे ब्रिटिश शासन के समर्थक भी पढ़ते थे और वे लोग भी, जो उस शासन को खत्म करना चाहते थे।

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अपने 145 वर्षों के इतिहास में दूसरी बार द ट्रिब्यून को 1947 के विभाजन के समय करीब 40 दिनों के लिए प्रकाशन रोकना पड़ा। उसी वर्ष मेरे पिता और उनके मित्र, प्रतिष्ठित पुस्तक विक्रेता प्रकाश कृष्णा, लाहौर छोड़ने वाले अंतिम लोगों में शामिल थे। वे दोनों किसी तरह जान बचाकर निकल पाए। कई साल बाद मेरे पिता ने एक बात कही थी, “यहां तक कि द ट्रिब्यून भी लाहौर छोड़ चुका था। कुछ समय के लिए अख़बार शिमला आ गया और मैं भी शिमला में ही आकर बस गया।”

दोनों ही कठिन दौर के बाद अख़बार और भी मजबूत होकर लौटा, मानो संघर्षों की आग में तपकर। इसकी निरंतरता ही इसकी सबसे बड़ी ताकत रही है।

आज के दौर में, जब “ईमानदारी” और “निडरता” जैसे शब्दों का अर्थ फीका पड़ता जा रहा है, तब ऐसी संस्थाएं बहुत कम हैं जो इन मूल्यों को सच में निभाती हों। द ट्रिब्यून ने बार-बार यह साबित किया है। लोग, घटनाएं और पल गुजर जाते हैं, लेकिन जो संस्थाएं टिकती हैं, वे इतिहास बनाती हैं। द ट्रिब्यून ऐसी ही एक मजबूत स्तंभ बनी हुई है।

— लेखक शिमला में रहते हैं

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