एक भरोसेमंद साथी
गंभीर रिपोर्टिंग से इतर, जिन चीज़ों ने मुझे सच में बांधे रखा, वे थीं अख़बार से मिलने वाली हल्की-फुल्की खुशियां — इसके सम्मानीय 'मध्य पृष्ठ लेख', क्रॉसवर्ड पज़ल पंजाब में बहुत से लोगों के लिए, ‘द ट्रिब्यून’ अखबार महज एक...
गंभीर रिपोर्टिंग से इतर, जिन चीज़ों ने मुझे सच में बांधे रखा, वे थीं अख़बार से मिलने वाली हल्की-फुल्की खुशियां — इसके सम्मानीय 'मध्य पृष्ठ लेख', क्रॉसवर्ड पज़ल
पंजाब में बहुत से लोगों के लिए, ‘द ट्रिब्यून’ अखबार महज एक प्रकाशन नहीं है; यह 'उत्तर भारत की दादी मां' जैसी है, एक स्थिर, गरिमापूर्ण उपस्थिति जो राजनीतिक बदलावों और दशकों के परिवर्तन के बाद भी कायम है। जब हम अमृतसर में स्कूल के दिनों में थे, तो हमें अख़बार पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था और मेरे दिल में, 'अख़बार' शब्द ही द ट्रिब्यून का पर्याय बन गया था। अख़बार विश्वसनीयता और ईमानदारी का प्रतीक था और हरेक शब्द को सवादिष्ट भोजन जैसी उत्सुकता से पढ़ा जाता था, मेरे पिता हमसे दिन भर की सुर्खियां और महत्वपूर्ण खबरों के बारे में पूछकर हमारा इम्तिहान लेते थे। हर सुबह, अख़बार का आना एक रस्म की तरह था, जैसे कि चाय की पहली चुस्की या दूधवाले की घंटी की आवाज़। यह एक भरोसेमंद साथी था जिसने दुनिया के बारे में हमारी समझ को आकार दिया। तेज़ी से बदलती दुनिया में, द ट्रिब्यून स्थायी भरोसे का प्रतीक बना हुआ है। अख़बारों, पत्रिकाओं और सोशल मीडिया के विज्ञापनों की बाढ़ के बावजूद, इस पुरानी आदत में कुछ ऐसा है जो हमें जोड़े रखता है, कुछ ऐसा जो मूल्यवान है।
गंभीर रिपोर्टिंग से इतर, जिस चीज़ ने मुझे सच में बांधे रखा, वे थीं इससे मिलने वाली हल्की-फुल्की खुशियां। सम्मानीय 'मिडल्स' (मध्य पृष्ठ) जिनमें लेखकों के व्यक्तिगत किंतु मूल्यवान विचार होते और क्रॉसवर्ड पज़ल तो सच में एक लत थी। भाई-बहन और मैं अख़बार हथियाने के लिए दौड़ लगाते, हाथ में पेंसिल लेकर, सबसे पहले क्रॉसवर्ड ग्रिड भरने के लिए मुकाबला जो था! दिए गए सुराग हमारे दिमाग को चुनौती देते थे, मुश्किल शब्दों पर बहस छिड़ती, और यह सब शांत दोपहर को साझा रोमांच में बदल देता।
एक ऐसे युग में जब शीर्ष पंक्तियों को सनसनीखेज बनाना अक्सर हावी रहता था, द ट्रिब्यून भरोसे का प्रतिनिधित्व करता था — एकदम दादा-दादी की तरह, जो मार्गदर्शन को सदा उपस्थित रहते हैं और एक तरफा फैसला देने या चीज़ों को तूल देने की बजाए स्थिर ज्ञान देते हैं। पंजाब के अशांत समय के दौरान, इसके पन्नों ने स्थिरता की भावना प्रदान की, सौम्य सुर में तथ्य प्रदान किए, वे जिनपर हम भरोसा कर सकते थे। चाहे वह अमृतसर की स्थानीय खबरें हों, राष्ट्रीय घटनाक्रम हों या अंतर्राष्ट्रीय मामले, इन्हें बिना किसी अतिशयोक्ति या उन्मादी सनसनीखेज बनाए प्रकाशित किया। मैं कभी भी इसके ऑनलाइन संस्करण का सब्सक्रिप्शन नहीं लूंगी क्योंकि मुझे भौतिक कॉपी का स्पर्श, सूखी स्याही की गंध, ताज़े पन्नों की खड़खड़ाहट पसंद है — एक परंपरा जो एक पुराने आश्वासक या एक प्यारे दोस्त की तरह कायम है।
- लेखिका चंडीगढ़ निवासी और नाट्य निर्देशक हैं

