एक पाठक भी और योगदानकर्ता भी
द ट्रिब्यून से मेरी जान-पहचान मेरी स्कूली शिक्षा के सातवें साल में शुरू हुई थी, जब मेरे पिता – जो इसके एक पक्के और समर्पित नियमित पाठक थे - यह अखबार घर में लेना शुरू किया। उन शुरुआती सालों में,...
द ट्रिब्यून से मेरी जान-पहचान मेरी स्कूली शिक्षा के सातवें साल में शुरू हुई थी, जब मेरे पिता – जो इसके एक पक्के और समर्पित नियमित पाठक थे - यह अखबार घर में लेना शुरू किया। उन शुरुआती सालों में, मेरी दिलचस्पी शायद ही कभी खेल पन्ने की सीमाओं से आगे बढ़ी हो। समय के साथ, मेरी रुचियां परिपक्व हुईं। सैटर्डे एक्स्ट्रा और संडे स्पेक्ट्रम मेरे मूल्यवान साथी बन गए, जिनमें निबंधों, विचारों और फीचर्स का एक ऐसा समृद्ध मिश्रण होता, जो विविधता भरे पाठकों की हर ज़रूरतों को पूरा किया करता। चिल्ड्रन्स कॉर्नर तो विशेषतौर पर मेरी कल्पना को हर लेता। प्रकाशित साहित्यिक भावना से प्रेरित होकर, मैंने कक्षा दस में एक छोटा सा लेख भेजने की हिम्मत जुटाई - एक ऐसा प्रयास जो छपा भी और सुखद आश्चर्य के तौर पर 10 रुपये का मानदेय भी मिला, जो मूल्य में भले ही छोटी सी राशि था, लेकिन प्रोत्साहन में बहुत बड़ा रहा।
जैसे-जैसे साल बीतते गए, मेरा पठन और भी गंभीर होता गया। संपादकीय, मध्य पृष्ठ के कॉलम, हरिहर स्वरूप द्वारा लिखे गए तीखे लेख हों या फिर सप्ताहांत परिशिष्टों के बौद्धिक खुराक मुहैय्या करवाते पौष्टिक फीचर्स हों, एक ज़रूरी पठनक्रम बन गए। खुशवंत सिंह का मशहूर कॉलम, 'दिस अबव ऑल', जल्द ही मेरा पसंदीदा बन गया। इतना ही दिलचस्प हरविंदर खेताल का 'टेक माई वर्ड' भी था।
यदि यहां पर मैं कादियान के भगवान सिंह - एक सच्चे विद्वान – के व्यक्त विचारों का मोल नहीं करूंगा तो यह घोर कृतघ्नता होती। उनके पत्र ज्ञान और तीखे विश्लेषण के सच्चे भंडार थे, जो चुनिंदा उर्दू एवं फारसी शेरों की खूबसूरती से सजे होते, साथ ही उनका त्रुटिहीन और सूक्ष्म अंग्रेजी अनुवाद भी हुआ करता। उनके लेखन ने अपने पत्रों में मुझे भी शास्त्रीय उर्दू शायरी को पिरोने का एक स्थायी स्नेह जगाया। अफसोस, अगस्त 2025 में उनके निधन से एक चमकदार बौद्धिक उपस्थिति का नुकसान हुआ।
मेरे पिता के निधन के बाद भी ट्रिब्यून के प्रति प्यार बना रहा। सात साल पहले कादियां से अंडमान द्वीप समूह स्थानांतरित होने तक, मैं द ट्रिब्यून का एक वफादार नियमित पाठक बना रहा। पोर्ट ब्लेयर में भी, मैं इसे ऑनलाइन पढ़ता रहता हूं, अलबत्ता मुझे इसको मुद्रित रूप में पढ़ने का स्पर्श सुख और सौम्य विलासिता की कमी बहुत अखरती है।

