जीवन भर का रिश्ता
द ट्रिब्यून से मेरा परिचय स्कूली छात्र के रूप में हुआ। तब से मेरा दिन चाय के एक कप और द ट्रिब्यून के साथ शुरू होता रहा है। मैं इसका एक भी अंक पढ़ने से नहीं चूका, यहां तक कि...
द ट्रिब्यून से मेरा परिचय स्कूली छात्र के रूप में हुआ। तब से मेरा दिन चाय के एक कप और द ट्रिब्यून के साथ शुरू होता रहा है। मैं इसका एक भी अंक पढ़ने से नहीं चूका, यहां तक कि टीचिंग असाइनमेंट पर अमेरिका में रहने के दौरान भी नहीं। मुझे अच्छी तरह याद है कि द ट्रिब्यून में मेरा पहला लेख 'संपादक के नाम पत्र' के रूप में छपा था। इसके बाद मैंने सिख इतिहास की लगभग सभी प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं पर समाचार पत्र के प्रकाशित विशेष परिशिष्टों में योगदान दिया— विशेष रूप से महाराजा रणजीत सिंह के शासन की द्विशताब्दी, गुरु गोबिंद सिंह की 350वीं जयंती, गुरु नानक की 550वीं जयंती और भाई वीर सिंह की 150वीं जयंती के अवसर पर।
अकाली आंदोलन पर अपने शोध के दौरान मुझे यह पता चला कि द ट्रिब्यून ही एकमात्र विश्वसनीय स्रोत था, जिसने अकालियों के पांच वर्षों (1920–25) तक चले संघर्ष को निरंतर कवर किया। मैंने प्रो. रुचि राम साहनी की उस विशेष प्रतिबद्धता को सराहा, जिसके तहत उन्होंने सरकारी झूठे प्रचार का प्रतिवाद करते हुए आंदोलन का सत्यपरक, दिन-प्रतिदिन का विवरण प्रस्तुत किया। जब प्रो. साहनी को यह अहसास हुआ कि द ट्रिब्यून के ट्रस्टी के तौर पर, वह गुरु-का-बाग जाकर शांतिपूर्ण अकाली स्वयंसेवकों के खिलाफ पुलिस की बर्बरता को उजागर नहीं कर सकते, तो उन्होंने ट्रस्टी पद से इस्तीफा दे दिया और संवाददाता बन गए। इससे उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ अकाली प्रतिरोध का आंखों देखा हाल बताने का मौका मिला— एक ऐसा आंदोलन जिसे महात्मा गांधी ने 'भारत के स्वतंत्रता संग्राम की पहली जीत' बताया था।
प्रो. साहनी ने अपनी पुस्तक 'स्ट्रगल फॉर रिफॉर्म इन सिख श्राइन्स' में भी इस आंदोलन का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया, जिसे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने 1965 में प्रकाशित किया था। अकाली आंदोलन की शताब्दी के अवसर आयोजित सेमिनार में हमने प्रो. रुचि राम साहनी की परपोती डॉ. नीरा बूरा को आमंत्रित किया और महान अकाली नेता तेजा सिंह समुंदरी के पौत्र राजदूत तरनजीत संधू के साथ सम्मानित किया।
इसी अवसर पर मेरे द्वारा संपादित पुस्तक ‘सीक्रेट एंड प्राइवेट पेपर्स ऑफ द अकाली मूवमेंट’ का भी विमोचन किया गया, जिसकी भूमिका मार्क टली ने लिखी है। एक रोचक संयोग के तहत, इस पुस्तक की समीक्षा द ट्रिब्यून के मैगजीन सेक्शन में 1 फरवरी, 2026 को प्रकाशित हुई।
मैं द ट्रिब्यून और इसके दूरदर्शी संस्थापक सरदार दयाल सिंह मजीठिया के बारे में भी निरंतर पढ़ता रहा हूं। यह जानकर प्रसन्नता होती है कि द ट्रिब्यून के ट्रस्टियों ने संस्थापक की विरासत की पूरी निष्ठा से रक्षा की है और इसके उदार चरित्र को बनाए रखा है। मुझे यह देखकर भी खुशी होती है कि प्रधान संपादक और संपादकीय स्टाफ आज भी बिना किसी भय या पक्षपात के बेबाक संपादकीय लिखते हैं।
द ट्रिब्यून ट्रस्ट के चेयरमैन श्री एनएन वोहरा के प्रोत्साहन से मैंने डॉ. अमरीक सिंह और डॉ. मनमोहन सिंह को श्रद्धांजलि स्वरूप द ट्रिब्यून में ‘डॉ. मनमोहन, द ऑथेंटिक जेंटलमैन’ शीर्षक से एक लेख लिखा।
— लेखक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पंजाब स्टडीज और भाई वीर सिंह साहित्य सदन, नयी दिल्ली के निदेशक हैं।

