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आधा रह गया काम,दीवाली पर हजारों उद्यमियों के साथ कर्मियों को झटका

संकट में पानीपत का घरेलू टेक्सटाइल कारोबार

आधा रह गया काम,दीवाली पर हजारों उद्यमियों के साथ कर्मियों को झटका

बिजेंद्र सिंह/निस

पानीपत, 24 अक्तूबर

कोरोना की दूसरी लहर के बाद कच्चे माल के भाव बढ़ने से टेक्सटाइल नगरी का घरेलू कारोबार दीवाली का पीक सीजन होने के बावजूद मंदी के दौर से गुजर रहा है। त्योहारों के मौसम में 12-12 घंटे की दो शिफ्टों में दिन रात चलने वाली फैक्टरियां अब ऑर्डरों की कमी के चलते एक शिफ्ट में भी मुश्किल से चल पा रही हैं। दीवाली के सीजन में शहर की हैंडलूम मार्केट में लगने वाली ग्राहकों की भीड़ आधी हो गई है। पिछले कुछ माह में कच्चे माल के 35-40 प्रतिशत बढ़े भाव ने उद्यमियों को एक नई परेशानी में डाल दिया है। पहले के मुकाबले पीक सीजन में घरेलू टेक्सटाइल कारोबारियों का काम अब करीब 50 फीसदी रह गया है और काम फिर से कब पटरी पर लौटेगा इसका भी कोई पता नहीं।

बता दें कि पानीपत में करीब 20 हजार छोटी बड़ी फैक्टरियां हैं और उनमें करीब 5 लाख श्रमिक काम करते हैं। पानीपत से टेक्सटाइल उत्पादों का देशभर में सालाना करीब 80 हजार करोड़ रुपए का घरेलू कारोबार है। यहां से कुशन, चादर, तौलिये, कंबल, परदे व सोफे का कपड़ा, दरी व पायदान देशभर में भेजे जाते हैं। कोरोना की पहली लहर के दौरान पिछले वर्ष लगाये गये लॉकडाउन के बाद पीक सीजन में घरेलू कारोबार में काफी तेजी आई और कारोबारियों का लॉकडाउन वाला घाटा काफी हद तक पूरा हो गया था। वहीं, इस वर्ष कोरोना की दूसरी लहर के मंद पड़ने पर घरेलू कारोबार ने गति पकड़ी और टेक्सटाइल उद्यमियों व कारोबारियों को पूरी उम्मीद थी कि इस बार दीवाली का सीजन बहुत अच्छा रहेगा, लेकिन उन्हें फिर निराशा हाथ लगी। पिछले कुछ माह से कच्चे माल धागा, डाई केमिकल, कोयला, माल भाड़े आदि के बढ़े भाव घरेलू कारोबार पर भारी पड़ गये।

20 हजार से अधिक टेक्सटाइल इंडस्ट्री हैं पानीपत में

80 हजार करोड़ का सालाना होता है व्यापार

05 लाख से ज्यादा कर्मचारी करते हैं यहां काम

भाड़ा बढ़ने से ऑर्डर हो गए कम

पानीपत से हर वर्ष 20-25 हजार करोड़ रुपए का कारपेट, बाथमेट, दरी, चादर, पफ आदि का निर्यात होता है। जिसमें करीब 50 फीसदी तो अकेले अमेरिका और बाकी यूरोपियन व अन्य देशों में होता है। कोरोना के चलते पानीपत के निर्यातकों को आपदा में अवसर मिला और चीन से टेक्सटाइल उत्पाद खरीदने वाले विदेशी खरीदारों का रुख पानीपत की तरफ हुआ। पिछले वर्ष से ही निर्यातकों को अच्छे ऑर्डर मिल रहे थे और निर्यात में पहले की बजाए बढ़ोतरी हुई, लेकिन अब पिछले कुछ माह से कंटेनरों का माल भाड़ा कई गुणा बढ़ने से यहां का निर्यात प्रभावित हुआ है। अमेरिका में जहां पहले करीब 3 हजार डालर में कंटेनर जाता था अब उसका भाड़ा बढ़कर 14-15 हजार डालर हो चुका है। बता दें कि विभिन्न देशों के लिये कंटेनरों का भाड़ा 3 से 5 गुना तक बढ़ चुका है। इसका सीधा असर पानीपत के निर्यात पर पड़ा है। इससे विदेशी खरीदारों ने ऑर्डर देने कम कर दिये हैं। कई खरीदारों ने तो ऑर्डर रोक भी दिए हैं।

निर्यातकों की मदद करे केंद्र सरकार

हरियाणा कारपेट मेन्युफेक्चरिंग एसोसिएशन के सचिव एवं कारपेट निर्यातक अनिल मित्तल ने बताया कि कोरोना के चलते अमेरिका व यूरोपियन देशों के नये खरीदारों का रुख पानीपत की तरफ हुआ और इससे निर्यात के ऑर्डर भी बढ़े थे, लेकिन अब कंटेनरों का भाड़ा कई गुणा बढ़ने से यहां से होने वाला निर्यात प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि इस मामले में केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए। यदि निर्यात कम हुआ तो विदेशी करंसी कम आएगी और इसका असर घरेलू कारोबार पर भी पड़ेगा।

सूरत की तर्ज पर बने मार्केट

पानीपत इंडस्ट्रियल एसोसिएशन एवं सीटीएमए के प्रधान राकेश चुघ ने कहा कि प्रदेश सरकार को पानीपत के टेक्सटाइल उद्योग को बढ़ावा देने के लिये गुजरात के सूरत की तर्ज पर अलग से टेक्सटाइल मार्केट बनवानी चाहिए। इससे निश्चित रूप से उद्योग को बहुत ज्यादा बढ़ावा मिलेगा। पानीपत में एसडी कालेज रोड, अमर भवन चौक, सेठी चौक सहित टेक्सटाइल की कई बड़ी मार्केट हैं, लेकिन तंग बाजारों में भीड़ रहती है। इसलिये बाहर के व्यापारी इन बाजारों में बहुत कम आते हैं। यदि टेक्सटाइल से संबंधी अलग से खुले स्थान पर मार्केट होगी तो बाहर के व्यापारी ज्यादा आएंगे। पानीपत में काफी जगह खाली है जहां मार्केट बनाई जा सकती है।

दूसरे देशों की तरह मिले सुविधाएं

हरियाणा कारपेट एसोसिएशन के पूर्व प्रधान एवं प्रमुख कारपेट निर्यातक जितेंद्र मलिक ने बताया कि कंटेनरों का किराया बढ़ने से सीधा असर पानीपत के निर्यात पर पड़ा है। पानीपत से करीब 50 फीसदी निर्यात अमेरिका में होता है और पिछले कुछ माह पहले तक अमेरिका के लिये कंटेनर का भाड़ा 2500 से 3000 हजार डालर के बीच था जोकि अब बढ़कर 14-15 हजार डालर हो चुका है। उन्होंने कहा की केंद्र व प्रदेश सरकारों को दूसरें देशों की तरह ही निर्यातकों को सुविधाएं देनी चाहिए।

धागे की बढ़ी कीमतों ने भी दिया झटका

पिछले वर्ष मार्च में लगे लॉकडाउन के दौरान से अगस्त माह तक घरेलू कारोबार पूरी तरह से प्रभावित रहा, लेकिन पिछले वर्ष सितंबर में काम चला और जनवरी 2021 तक करीब 5 माह तक घरेलू कारोबार बहुत अच्छा रहा। मिंक कंबल प्लांट के संचालक एवं प्रमुख उद्योगपति लोकेश भाटिया ने बताया कि इन पांच माह के दौरान कारोबारियों का लॉकडाउन वाला घाटा भी काफी हद तक पूरा हो गया। उन्होंने बताया कि पॉलिस्टर धागे के रेट 95 से बढ़कर 130-132 रुपए प्रति किलो हो गए हैं और इससे पानीपत का मिंक व पोलर कंबल और थ्री डी चादर उद्योग पूरी तरह से प्रभावित हुआ है।

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