मथुरा सिर्फ एक शहर नहीं, कृष्ण की जीवंत अनुभूति है। यहाँ मंदिरों की घंटियों से लेकर गलियों की स्मृतियों तक, हर ओर उनकी उपस्थिति महसूस होती है। जन्माष्टमी के आते ही यह अनुभूति और गहरी हो जाती है और पूरा ब्रज कृष्णमय दिखाई देता है।
भादो का महीना आते ही एक शहर अचानक सिर्फ शहर नहीं रह जाता, बल्कि भक्ति और भावना का संगम बन जाता है। ये है—भगवान कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा। इस महीने में, जो कि 29 अगस्त से शुरू हो चुका है, मथुरा की गलियां अपने आपमें तीर्थ बन जाती हैं। यहां की हर गली में मौजूद अनेक मंदिरों वाला यह शहर एक विशाल पूजा उत्सव में बदल जाता है। जन्माष्टमी के दिन यहां पूरी रात देश के कोने-कोने से आए लाखों तीर्थयात्री भक्ति का जागरण करते हैं तो पूरे भादो महीने यहां देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आए तीर्थयात्रियों की उत्सवमयी मौजूदगी की हलचल रहती है। इस महीने में तो यह पूरा शहर कृष्णमय उत्सव का साक्षी बन जाता है।
इस साल कृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर को है और एक पखवाड़े पहले से ही तीर्थयात्रियों के ठहरने वाली सभी जगहें फुल हो चुकी हैं। लेकिन यह बात भी है कि इस शहर में तीर्थयात्रियों को ठहरने की कभी समस्या नहीं रहती, क्योंकि एक दशक पहले आई घर पर पर्यटकों को ठहराने की नीति के कारण मथुरा में बहुत सारे लोग इस मौके पर अपने घरों को तीर्थयात्रियों के लिए खोल देते हैं। इस शहर की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां कृष्ण केवल मंदिर में देवता के रूप में ही विराजमान नहीं रहते, बल्कि शहर की हर गली, हर कोने, हर नुक्कड़ में लोकस्मृति और संस्कृति की जीवंतता में कृष्ण की मौजूदगी रहती है। भगवान कृष्ण का जन्मस्थान वह जगह है, जहां परंपरा के मुताबिक कंस के कारागार में देवकी और वासुदेव के नंदन कृष्ण का प्राकट्य हुआ था। कृष्ण की यही लोकस्मृति है, जिसके कारण मथुरा सामान्य धार्मिक नगरों से अलग, एक अलग ही तरह का तीर्थस्थल है।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि की सबसे बड़ी विशेषता उसका धार्मिक अर्थ ही नहीं, उसकी कथा का नाटकीय चरित्र भी है। अत्याचारी कंस का कारागार, देवकी-वासुदेव की आजीवन कैद, आधी रात में कृष्ण का जन्म और फिर नवजात शिशु को लेकर वासुदेव का यमुना पार करके गोकुल पहुंचना—हजारों साल से यह कथा भारतीय जनमानस में इस कदर रची-बसी है कि यहां आने वाला हर श्रद्धालु हर जगह कृष्ण की मौजूदगी देखता है। यही कारण है कि मथुरा आने वाले तीर्थयात्री सिर्फ मंदिर का दर्शन नहीं करते। वे पूरे कथा-केंद्र यानी मथुरा में जगह-जगह घूमते हैं और जहां-जहां कृष्ण की मौजूदगी के वृतांत मौजूद हैं, उन जगहों तक पहुंचकर भक्ति-भावना में आनंदित होते हैं। यही कारण है कि जन्माष्टमी की आधी रात सामान्यतः पूरा मथुरा ही नहीं, बल्कि लाइव प्रसारण के कारण आजकल पूरी दुनिया में जागता हुआ मथुरा जीवंत रहता है। जैसे ही 12 बजते हैं, मंदिरों की घंटियां, शंख, भजन-कीर्तन की ध्वनियों से पूरा शहर और लाइव प्रसारण के कारण जहां-जहां तक यह प्रसारण पहुंचता है, गूंजायमान हो जाता है।
मथुरा की ताकत केवल कृष्ण जन्मभूमि तक सीमित नहीं है। इसके आसपास पूरा ब्रज कृष्ण-कथा का विस्तृत सांस्कृतिक भूगोल बन जाता है। मथुरा अगर भगवान कृष्ण की जन्मभूमि है, तो वृंदावन बालकृष्ण की लीलाओं का केंद्र है। यहीं किशोर और युवा कृष्ण अपनी तरह-तरह की लीलाओं से पूरे हिंदू समाज की स्मृति को हमेशा-हमेशा के लिए कृष्ण के रूप में जीवंत कर चुके हैं। वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण गोपियों के साथ रास करते थे और इसके इर्द-गिर्द बसे गोकुल, गोवर्धन, नंदगांव और बरसाना एक समूचा सांस्कृतिक वृत्त बनाते हैं, जो सावन से लेकर भादो के अंत तक भक्ति-भावना में कृष्णमय बना रहता है। भादो के महीने में तो पूरा ब्रज क्षेत्र कृष्ण लीलाओं का एक विशाल मंच बन जाता है। मंदिर, फूलों और रोशनी से सजा विशाल मंच, जहां झांकियां निकलती हैं, रास लीलाएं होती हैं और भजन-कीर्तन तो अनवरत चलते रहते हैं। जन्माष्टमी के दौरान मथुरा-वृंदावन और पूरा ब्रज क्षेत्र आस्था, संगीत, परंपरा और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का विशाल उत्सव बन जाता है।
दरअसल, भादो में यहां श्रद्धालुओं और सैलानियों का सैलाब इसलिए उमड़ता है, क्योंकि कृष्ण जन्माष्टमी का आकर्षण केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं होता, बल्कि लोग उस क्षण को प्रत्यक्ष अनुभव करने की इच्छा से यहां आते हैं। कृष्ण परंपरा में भगवान कृष्ण के जन्म को वही क्षण माना जाता है, जब ब्रज क्षेत्र में भगवान कृष्ण की मौजूदगी का भावनात्मक अहसास होता है। आधी रात में यह अहसास अपने चरम तक पहुंच जाता है और अगर आप जन्माष्टमी के समय मथुरा आए तीर्थयात्रियों से पूछें, तो वे पूरे विश्वास के साथ कहते हैं कि उस रात उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का जीवंत अनुभव हुआ। दरअसल, भादो के महीने में पूरे ब्रज क्षेत्र में भगवान कृष्ण की यह भक्तिमय मौजूदगी वातावरण में चुंबकीय आकर्षण के रूप में मौजूद रहती है। किसी शहर को किसी विशेष समय पर लैंडमार्क बनने के लिए कितनी सघन भावनाएं चाहिए कि उन भावनाओं के चुंबकीय संवेग में कुछ और अहसास ही न हो और मथुरा में भादो के महीने में कृष्ण की मौजूदगी का यही चुंबकीय संवेग यहां आए श्रद्धालु महसूस करते हैं। इसलिए भादो में मथुरा देश ही नहीं, बल्कि भक्तों के लिए पूरी दुनिया का सबसे चुंबकीय और प्रसिद्ध लैंडमार्क बन जाता है। इ. रि.सें.

