हेनरी डेविड थोरो ने जब अन्यायपूर्ण कर देने से मना किया, तो उन्हें कारागार में डाल दिया गया। रात को उनका मित्र मिलने आया और बोला, ‘तुम जैसे विद्वान को यहां देखकर दुःख होता है, तुमने कर क्यों नहीं दे दिया?’ थोरो मुस्कराए और बोले, ‘यदि मैं अन्याय को स्वीकार कर दूं, तो मैं बाहर होकर भी कैदी रहूंगा।’ मित्र ने पूछा, ‘क्या एक व्यक्ति के विरोध से कुछ बदलता है?’ थोरो ने शांत स्वर में कहा, ‘जब एक व्यक्ति सत्य के साथ खड़ा होता है, तभी अन्य लोगों को भी खड़े होने का साहस मिलता है।’ अगले दिन जब वे रिहा हुए, तो लोगों ने पूछा, ‘डर नहीं लगा?’ उन्होंने कहा, ‘डर अन्याय से समझौता करने में था, जेल में नहीं।’ उस दिन लोगों को समझ आया कि सच्ची स्वतंत्रता बाहर नहीं, अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने में होती है, जो सत्य के लिए अकेला खड़ा हो जाए, वही दूसरों के लिए मार्ग बन जाता है।
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