बनारस में सज्जन नाम के एक महाज्ञानी गुरु रहते थे। उनसे शिष्य शिक्षा ग्रहण करते थे। आम के वृक्ष के नीचे शिष्यों से सज्जन कह रहे थे-‘मानव को अपने जीवन में सदा सत्य वचन ही बोलना चाहिए। तभी एक शिकारी दौड़ता हुआ गुरु के पास आकर बोला-‘गुरुजी! मेरे प्राण संकट में हैं, मेरी रक्षा करो, यदि मैं मर गया तो मेरे अंधे मां-बाप बे-सहारा हो जाएंगे ।’गुरु ने कारण पूछा तो वह बोला- ‘मैंने शिकार समझ कर तीर छोड़ा तो वह आदिवासी को लगा अब आदिवासी लोग मुझ पर तीर चलाने लगे, मैं अपनी जान बचाकर भागा, वे आदिवासी भी तीर और भाले लेकर पीछे-पीछे आ रहे है। गुरु ने कहा-‘घबराओ मत। शरण में आये व्यक्ति की रक्षा करना मेरा कर्त्तव्य है, तुम आश्रम में जाकर एक कोने में छिप जाओ। थोड़ी ही देर में आदिवासी तीर और भाले लेकर आये और पूछा- ‘महात्मा जी। क्या इधर से कोई आदमी गुजरा है? गुरुजी ने कहा, ‘इधर तो कोई आदमी नहीं आया।’ गुरु की बात सुनकर आदिवासी दूसरे रास्ते की तरफ बढ़ गये। तभी एक शिष्य ने पूछा, ‘लेकिन, गुरुजी! आप तो कह रहे थे, मानव को सदा सत्य वचन बोलना चाहिए?’ गुरुजी ने कहा, ‘अगर झूठ बोलने से किसी व्यक्ति के प्राण बच जायें तो वह झूठ सौ सत्य से भी बढ़कर कहलाता है।’
+
Advertisement
Advertisement
Advertisement
×

