एक बार गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर हिमालय की यात्रा पर थे। केदारनाथ के सौंदर्य से अभिभूत होकर वह बार-बार कुछ गाने लगते थे। चलते-चलते जब वे थक गए, तो एक ढाबे जैसी जगह पर रुके। उनके साथ सहायकों की टोली थी। गुरुदेव को खिचड़ी बहुत पसंद है, यह सभी जानते थे। लेकिन इस स्थान पर केवल भुने हुए आलू और हरे नमक ही खाने के लिए मिले। गुरुदेव को यह एक हरे पत्ते में परोसा गया। गुरुदेव इतने चाव से इसका रसास्वादन करने लगे, मानो बचपन से ही उन्हें यही आहार पसंद हो। सहयोगी टोली खामोश रही, क्योंकि इस समय कुछ कहना या टोकना किसी ने भी उचित नहीं समझा। कुछ समय बाद, जब फिर से चलने का क्रम आरंभ हुआ, तो बातों ही बातों में एक ने पूछ लिया, ‘गुरुदेव, आपको वह भुना आलू इतना स्वादिष्ट लगा, क्या सच है?’ गुरुदेव ने संतोषपूर्ण भाव से जवाब दिया, ‘स्वाद और जायके का कोई अलग या विशिष्ट रूप नहीं होता। जब किसी खाद्य पदार्थ की रसानुभूति उस माहौल में सबसे अधिक अच्छी लगे, जिह्वा के साथ मन को तृप्त कर दे, तो वही सर्वोत्तम आहार है।’
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