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दीक्षा से परिवर्तन

एकदा

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एक रानी ने श्रद्धावश सिद्ध संत नागार्जुन को राजमहल में आमंत्रित किया। महल में रानी ने उनसे कहा, ‘मुझे आपका भिक्षा पात्र चाहिए।’ नागार्जुन ने बिना किसी हिचक के अपना भिक्षा पात्र दे दिया। बदले में रानी ने हीरों से जड़ा स्वर्णिम भिक्षा पात्र उन्हें अर्पित किया और भावुक स्वर में कहा, ‘आपका पुराना पात्र मैं पूजूंगी।’ नागार्जुन ने दोनों को समान भाव से देखा। महल से निकलते समय एक चोर की दृष्टि उस चमकते पात्र पर पड़ी। नागार्जुन सब देख रहे थे। उन्होंने अचानक वह पात्र उठाया और मंदिर के बाहर फेंक दिया। चोर पात्र उठाकर जाने ही वाला था, पर उसके कदम रुक गए। उसकी आवाज कांप उठी, ‘आप अद्भुत हैं। मेरी ज़िंदगी अंधकार में डूब चुकी है। मैं चोर हूं। क्या मैं आपके चरण छू सकता हूं?’ चरण छूते ही चोर के भीतर कुछ जाग गया। उसने दिव्यता की एक झलक पाई और पूछा, ‘आप जैसा बनने में मुझे कितने जन्म लगेंगे?’ नागार्जुन ने कहा, ‘यह अभी हो सकता है, यहीं, इसी क्षण।’ नागार्जुन बोले, ‘यदि किसी पुराने घर में सदियों से अंधेरा हो और एक दीया जलाया जाए, तो क्या अंधेरा यह कहेगा कि मैं नहीं जाऊंगा?’ चोर ने पूछा, ‘क्या मुझे चोरी छोड़नी होगी?’ नागार्जुन ने शांत स्वर में कहा, ‘यह तुम्हारा चुनाव है।’ कुछ दिन बाद उसकी आंखों में अपराध नहीं, शांति थी। उसने कहा, ‘मैं फंस गया हूं। ध्यान के साथ चोरी संभव ही नहीं।’ नागार्जुन ने कहा, ‘अब चुनाव तुम्हारा है, धन या शांति।’ चोर ने सिर झुका दिया, ‘मैं अचेतन होकर नहीं जी सकता। मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।’ नागार्जुन ने प्रेम से कहा, ‘मैंने तुम्हें दीक्षा पहले ही दे दी है।’

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