Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

संवेदना का मेहनताना

एकदा

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

मुम्बई आकर हिंदी फिल्मों में गीत लिखने से पहले साहिर लुधियानवी लाहौर में रहते थे और वहां से उर्दू की मासिक पत्रिका ‘साकी’ निकालते थे। सीमित साधन होने के बावजूद वे प्रकाशित रचनाओं पर लेखकों को यथासंभव मेहनताना भी देते थे। हाथ तंग होने के कारण एक दफा जब वे मेहनताना समय पर न दे पाए तो ‘शमा’ लाहौरी नामक एक शायर उनके घर अपनी प्रकाशित ग़ज़लों का मेहनताना लेने आ पहुंचा, क्योंकि उसे पैसों की सख्त जरूरत थी। कड़क सर्दी वाले दिन बिना स्वेटर में आया वह शायर, ठंड से बुरी तरह कांप रहा था। उसकी यह हालत देख तंगहाल साहिर ने पहले तो उसे चाय पिलाई, फिर हैंगर पर टंगा अपना नया कोट उसे पहनाते हुए बोले, ‘आपके मेहनताने का मनीऑर्डर हम इसलिए नहीं भेज पाए क्योंकि इस महीने से हमने शायरों को ‘कैश’ के बदले ‘काइंडनेस’ देने का फैसला किया है।’ बेचारा शायर साहिर का मुंह देखता रह गया।

Advertisement
Advertisement
×