यह प्रसंग उस समय का है जब खुदीराम बोस मुजफ्फरपुर जेल में बंद थे। उन्हंे 11 अगस्त, 1908 को फांसी दी जाने वाली थी। रक्षाबंधन से कुछ दिन पहले एक महिला उनसे मिलने पहुंची। खुदीराम बोस उसे मामी कहकर पुकारते थे। मामी ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा। रक्षा सूत्र बंधवा कर खुदीराम बोस मुस्करा दिए। मामी भावुक होकर बोली, ‘बेटा, रक्षा का सूत्र बांधने पर बहनें अपने भाई से रक्षा का वचन मांगती हैं। लेकिन तू तो खुद मौत के सामने खड़ा है। मैं भला तुझसे क्या मांगू? मैं तो यही दुआ करती हूं कि तुझे लंबी उम्र मिले।’ यह सुनकर खुदीराम बोस उस धागे को चूमते हुए बोले, ‘यह धागा केवल एक बहन की रक्षा का नहीं, बल्कि पूरे देश की बहनों की आजादी और सम्मान की रक्षा का संकल्प है। मैं अपनी जान देकर इस रक्षा सूत्र का मान रखूंगा ताकि देश की हर बहन सिर उठाकर देश में आजादी के साथ जी सके। उम्र लंबी होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, बस जितनी भी हो, उतनी देश के काम आनी चाहिए।’ यह सुनकर मामी फूट-फूट कर रोने लगी और उसे आशीर्वाद देते हुए बोली, ‘जिस देश में तेरे जैसे देशभक्त होंगे, उस देश की बेटी सदा सिर उठाकर ही जिएगी।’ खुदीराम बोस ने देश के लिए हंसते-हंसते जान दी और रक्षा सूत्र का मान रखा।
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