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शिलाखंडों में रहस्य और आस्था का अलौकिक संसार

सिद्धनाथ शिव मंदिर

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बैतूल के भैंसदेही में स्थित सिद्धनाथ शिव मंदिर अपनी अद्भुत शिल्पकला और रहस्यमयी निर्माण कथा के लिए प्रसिद्ध है। 15वीं शताब्दी में विशाल शिलाखंडों से निर्मित मंदिर से जुड़ी महाभारत कालीन अलौकिक कथाएं जनश्रुति के रूप में चर्चित हैं।

मध्य प्रदेश के आदिवासी कोरकू बहुल जिला बैतूल के सतपुड़ा पर्वत शृंखलाओं से घिरे पूर्णा नदी के उद्गम स्थल भैंसदेही में स्थित सिद्धनाथ शिव मंदिर अपनी अद्भुत शिल्पकला और रहस्यमयी निर्माण कथा के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर 15वीं शताब्दी में विशाल शिलाखंडों से निर्मित है। जनश्रुति के अनुसार, इस विशाल शिलाखंडों से बने मंदिर का निर्माण केवल एक ही रात में किया गया था। कहा जाता है कि भोजर नाम के दो शिल्पकारों को यह वरदान प्राप्त था कि वे रातों-रात किसी भी निर्माण को पूरा कर सकते थे। मंदिर का निर्माण करते समय एक श्राप के कारण दोनों शिल्पकार पत्थर के बन गए, तभी से यह मंदिर बिना शिखर के अधूरा खड़ा हुआ है।

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सूर्य की पहली किरण शिवलिंग पर

मंदिर में तीन प्रवेश द्वार हैं। इसकी बनावट ऐसी है कि सूर्य की पहली किरण सीधे गर्भगृह में स्थित शिवलिंग पर पड़ती है, वहीं पूर्णिमा की रात में चंद्रमा की रोशनी भी शिवलिंग तक पहुंचती है। गर्भगृह में स्थित नंदी बाबा की प्रतिमा को यदि किसी वस्तु से तेजी से छुआ जाए तो उससे घंटी जैसी ध्वनि सुनाई देती है।

जनश्रुति के अनुसार, जब इस क्षेत्र में वर्षा कम होती थी और सूखा पड़ता था, तो यहां के आदिवासी मंदिर के गर्भगृह को जल से भरते थे और जैसे ही जलस्तर शिवलिंग तक पहुंचता, तुरंत तेज बारिश शुरू हो जाती थी।

महिषादेही से भैंसदेही तक

प्राचीन काल में भैंसदेही रघुवंशी राजा गय की राजधानी महिष्मती के नाम से जानी जाती थी। समय के साथ इसका नाम परिवर्तित होकर महिश्वती, फिर महिषादेही और अंततः भैंसदेही हो गया।

मनमोहक सूर्यास्त का दृश्य

कुकरू महादेव पहाड़ियों का दूसरा सबसे ऊंचा स्थान है। समुद्र तल से 3676 फीट की ऊंचाई पर स्थित भोंडियाकुंड गांव के पास सतपुड़ा पर्वत शृंखला में पहाड़ों के बीच सूर्यास्त का दृश्य अत्यंत मनमोहक होता है। इनमें से दो पहाड़ महाराष्ट्र की सीमा पर और पांच मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित हैं। यहां सूर्यास्त का दृश्य लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता है।

महाभारत कालीन प्रसंग

सिपना नदी मध्य प्रदेश के भोंडियाकुंड से निकलती है, जो सात पर्वतों में से पांचवें पर्वत क्षेत्र से गुजरती है। यह नदी राज्य में केवल दो से तीन किलोमीटर तक बहती है, जिसके बाद यह महाराष्ट्र के मेलघाट टाइगर रिजर्व कॉरिडोर से होते हुए अमरावती की ओर जाती है। सूर्यास्त के समय यह दृश्य एक माहिम रेखा जैसा प्रतीत होता है। माना जाता है कि महाभारत काल में महाबली भीम ने यहां शिवलिंग की स्थापना कर तप किया था और चिखलदरा में कीचक का वध किया था।

आध्यात्मिक टूरिज्म का विस्तार

यह क्षेत्र इको टूरिज्म के लिए अत्यंत उपयुक्त स्थल है। यहां मुक्तागिरी, मेंधागिरि (52 मंदिर), प्राचीन शिव मंदिर, धूनी वाले दादाजी मंदिर, शारदा मंदिर, साईं मंदिर, शीतला माता मंदिर, पवनचक्की डेडपानी, धामनगांव का रेणुका माता मंदिर, शासकीय उद्यान काटोल नर्सरी भैंसदेही तथा गुप्तवाड़ा शिव मंदिर जैसे प्रमुख स्थल स्थित हैं।

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