Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

प्रकृति की प्रबलता

एकदा

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

धर्मयात्रा पर चलते-चलते महात्मा बुद्ध ने जब थकान महसूस की, तो सुस्ताने के लिए एक वृक्ष के नीचे छाया में विश्राम करने लगे। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य आनन्द से कहा, ‘प्यास लगी है तुम निकट के झरने से पानी ले आओ।’ आनन्द जब झरने के तल पर पानी लेने गया तो कुछ देर पहले एक बैलगाड़ी के गुजरने से पानी गंदला हो गया। फिर आनन्द स्वच्छ जल की तलाश में अन्यत्र जाने लगा। तब महात्मा बुद्ध ने कहा, ‘आनन्द धीरज रखो, इसी झरने से पानी ले आना।’ फिर कुछ समय बाद आनन्द उसी झरने पर पानी लेने गया तो उसने देखा कि गंदला पानी बह चुका था। उसने प्रसन्न होकर कमंडल में जल भरा और ले आया। महात्मा बुद्ध ने तब मुस्कराते हुए आनन्द से कहा, ‘तुम जीवन में प्रकृति को देखा करो, परिस्थिति को नहीं। हमेशा परिस्थिति बदल जाती है लेकिन प्रकृति सदैव स्थिर रहती है। यदि मनुष्य में सुसंस्कार, श्रेष्ठता आदि सद्गुणों का समावेश है तो तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद वे दीर्घकाल में महकते हैं। प्रकृति निर्विवाद रूप से प्रबल है। वह श्रेष्ठता को स्वतः स्थापित कर देगी।’

Advertisement
Advertisement
×