एक नगर में महात्मा कबीर ठहरे हुए थे। वे साधारण वस्त्र पहनते थे, लेकिन उनके वचन अत्यंत गहरे और प्रभावशाली होते थे। एक दिन एक धनी व्यक्ति कबीर के पास आया और बोला—‘महात्मा जी, मेरे पास धन, प्रतिष्ठा और सुविधाएं सब कुछ हैं, फिर भी मन अशांत रहता है। मुझे शांति कैसे मिले?’ कबीर मुस्कराए और बोले—‘तुम्हारे पास सब कुछ है, पर तुम स्वयं अपने पास नहीं हो।’ यह सुनकर वह व्यक्ति चकित रह गया। कबीर ने पास रखी मिट्टी की एक हांडी उठाई और कहा—‘इसे सोने से भर दो।’ व्यक्ति ने हांडी को सोने से भर दिया। फिर कबीर ने पूछा—‘अब इसमें और कुछ समा सकता है क्या?’ वह बोला—नहीं। तब कबीर ने कहा—‘बस, यही तुम्हारी समस्या है। जब मन अहंकार, लोभ और संग्रह से भरा हो, तो शांति के लिए स्थान कहां बचेगा?’ यह सुनकर उस व्यक्ति का सिर झुक गया। उसे समझ आ गया कि अशांति का कारण बाहर नहीं, उसके भीतर है। उसने अपने अहंकार को छोड़ने का संकल्प लिया। कबीर ने अंत में कहा—‘जब मन खाली होता है, तभी उसमें सत्य और शांति का वास होता है।’
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