स्वामी रामतीर्थ एक बार जापान यात्रा के दौरान एक सुंदर बगीचे से गुजर रहे थे। उस बगीचे का वृद्ध माली अत्यंत तन्मयता से पौधों की छंटाई कर रहा था। स्वामी जी ने देखा कि वह माली एक-एक फूल और पत्ती को इतने प्रेम और आदर से छू रहा था, जैसे किसी मंदिर में भगवान की पूजा कर रहा हो। स्वामी जी उसके पास गए और मुस्कुराते हुए पूछा, ‘अरे भाई! तुम इस तपती धूप में इतनी मेहनत कर रहे हो, क्या तुम्हें थकान नहीं होती? तुम्हें इस काम का कितना वेतन मिलता है?’ वृद्ध माली ने नम्रता से अपना सिर झुकाया और कहा, ‘महाराज! मुझे जो वेतन मिलता है, उससे मेरा परिवार तो आसानी से चल जाता है। लेकिन मैं इन पौधों की देखभाल पैसों के लिए नहीं करता।’ स्वामी जी ने कौतुक से पूछा, ‘फिर किसलिए करते हो?’ माली ने उत्तर दिया, ‘यह बगीचा मेरे देश की सुंदरता है। जब भी कोई विदेशी या पथिक यहां से गुजरता है और इन खिले हुए फूलों को देखकर मुस्कुराता है, तो मुझे लगता है कि मैंने अपने देश की सेवा कर ली। यह फूल केवल पौधे का हिस्सा नहीं हैं, यह मेरे देश का रूप हैं। यदि इनमें से एक भी फूल मुरझाया रहा, तो मेरे देश की शोभा कम होगी।’ स्वामी रामतीर्थ ने अपने शिष्यों की ओर देखा और कहा, ‘सच्ची देशभक्ति और ईश्वर-भक्ति कोई अलग-अलग चीजें नहीं हैं। जब मनुष्य अपने छोटे से छोटे काम को देश और समाज की पूजा मानकर पूरी निष्ठा से करता है, वही सबसे बड़ी साधना बन जाती है।’
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