संत ईसप का जन्म एक ग़ुलाम परिवार में हुआ था, किंतु वह बचपन से ही संस्कारी थे। ईसप के युवा होने पर उनका मालिक उन्हें अन्य दो गुलामों के साथ बाज़ार में बेचने ले गया। वहां दार्शनिक जॉनसन भी एक ग़ुलाम खरीदने आए हुए थे। जॉनसन ने एक ग़ुलाम से पूछा, ‘तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो।’ ग़ुलाम सिर झुकाकर बोला ‘जी, जो आप कहें।’ दूसरे ने भी इसी प्रकार का जवाब दिया, ‘जी, हम दोनों मिलकर सारा काम निपटा देंगे।’ अब जॉनसन ने ईसप से पूछा तो वह बड़ी विनम्रता से बोले ‘जब सारा काम यह दोनों ही निपटा देंगे तो मेरे करने के लिए बचेगा ही क्या।’ ईसप का चतुराई भरा जवाब सुनकर जॉनसन बहुत प्रभावित हुए और उससे पूछा, ‘अगर मैं तुम्हें ही खरीद लूं तो क्या तुम ईमानदारी से काम करोगे।’ ईसप ने सहजता से जवाब दिया, ‘श्रीमान जी, आप मुझे खरीदें या न खरीदें, मेरी ईमानदारी सदा मेरे साथ ही रहेगी।’ ईसप की सच्चाई के आगे नतमस्तक होकर जॉनसन ने उन्हें खरीद लिया। यही गुलाम ईसप आगे चलकर उच्चकोटि के साहित्यकार और धर्मपरायण संत बने।
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