बुद्ध पूर्णिमा आज

सही ज्ञान का बोध ही है बौद्ध हो जाना

सही ज्ञान का बोध ही है बौद्ध हो जाना

नवीन कुमार नीरज

भगवान बुद्ध के जीवन में एक अद्भुत संयोग है, कहा जाता है, वे वैशाख पूर्णिमा के दिन जन्मे, उन्हें वैशाख पूर्णिमा के दिन ही ज्ञान की प्राप्ति हुई और इसी दिन उन्होंने शरीर का त्याग भी किया। यह दिन भगवान बुद्ध के लिए कितना विशेष रहा होगा! बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए यह दिवस विशेष महत्व रखता है। वैशाख पूर्णिमा हिंदुओं के लिए भी पवित्र और पावन मानी गयी है। हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार भगवान बुद्ध भगवान विष्णु के नौवें अवतार हैं।

बिहार के गया जिले में जहां बौद्ध विहार अवस्थित है, कहते हैं कि उसी जगह बुद्ध को वैशाख पूर्णिमा के दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। बौद्ध धर्म एवं दर्शन में ज्ञान प्राप्त करने को निर्वाण कहा गया है। इसलिए इस दिन को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। बुद्ध, वह जिसका बोध जाग गया है, जो भवसागर से पार हो गया है। इस दिन सिद्धार्थ बुद्ध हो गए थे। जिस वट-वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई, उसे हर प्रकार से संजोने की कोशिश की जाती है, ताकि बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के वक्त जो कुछ घटित हुआ था, उसे उस वृक्ष के सहारे अक्षुण्ण रखा जा सके। इसी संदर्भ में बुद्ध पूर्णिमा विशेष महत्व रखती है।

माना जाता है कि बुद्ध पूर्णिमा के दिन वातावरण विशेष प्रकार की ऊर्जा से भर जाता है। आध्यात्मिक दिव्यता, पवित्रता दिव्य लोक से पृथ्वी पर उतर आती है। इस दिव्यता का आध्यात्मिक विकास में विशेष महत्व होता है। यह दिन आध्यात्मिक साधकों के लिए विशेष फलदायी होता है। यही इस दिन को विशेष बनाता है।

श्रीलंका, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया आदि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में बुद्ध पूर्णिमा को ‘वेसाक’ उत्सव के रूप में मनाते हैं। ‘वेसाक’ ‘वैशाख’ शब्द का अपभ्रंश रूप है। बुद्ध के अनुयायी इस दिन अपने घरों में दीप जलाते हैं और घर-दरवाजे को फूलों से सजाते हैं। बौद्धों के लिए इस अवसर पर बोधगया आने का विशेष महत्व है। सभी देशों से बुद्ध के अनुयायी इस अवसर पर बोधगया आकर बुद्ध की अाराधना करते हैं। इस अवसर पर प्रार्थनाएं की जाती हैं, बुद्ध की पूजा होती है। बौद्ध धर्म ग्रंथों का पाठ किया जाता है। विहारों में दीप जलाए जाते हैं, बौद्ध-ध्वज फहराए जाते हैं। बोधिवृक्ष को पूजा जाता है, शाखाओं को हार और रंग-बिरंगी पताकाओं से सजाया जाता है। वृक्ष के आस-पास दीये जलाकर जड़ों में दूध और सुगंधित पानी डाला जाता है। इस दिन दान-पुण्य करने पर विशेष बल दिया जाता है। गरीबों को भोजन कराया जाता है, उन्हें वस्त्र बांटे जाते हैं। पिंजरे से पक्षियों को आज़ाद कर दिया जाता है।

हिंदुओं के बीच बुद्ध पूर्णिमा मनाने का चलन विशेष रूप से उत्तर भारत में ही है, क्योंकि दक्षिण भारत में बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार नहीं माना जाता। दक्षिण भारत में बलराम को आठवां एवं भगवान कृष्ण को विष्णु का नौवां अवतार माना गया है। बुद्ध पूर्णिमा के दिन हिंदू भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की अाराधना करते हैं। मान्यता यह है कि इस दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन को सिद्ध विनायक पूर्णिमा या सत्य विनायक पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता यह है कि इस दिन किया गया स्नान पापों को मिटाने में सहायक होता है। इस दिन सुबह उठते ही लोग घर की साफ-सफाई में लग जाते हैं। घर के मुख्य-द्वार पर रोली, हल्दी, कुमकुम का स्वास्तिक बनाया जाता है। घर में गंगा-जल का छिड़काव किया जाता है। शाम को चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। विशेष बात यह है कि इस दिन मन की शुद्धता और पवित्रता पर विशेष बल देने की आवश्यकता है।

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