सम्राट अशोक एक दिन अपने साम्राज्य का निरीक्षण करते हुए एक बौद्ध भिक्षु से मिले। भिक्षु के हाथ में केवल एक मिट्टी का कटोरा था। अशोक ने पूछा— ‘तुम्हारे पास इतना ही है?’ भिक्षु मुस्कराया— ‘महाराज, इससे अधिक मेरी आवश्यकता नहीं।” यह उत्तर अशोक को भीतर तक छू गया। उनके पास असीम सत्ता, सोना और सेनाएं थीं, फिर भी मन अशांत था; जबकि सामने खड़ा व्यक्ति अल्प साधनों में पूर्ण शांत था। उसी क्षण अशोक को बोध हुआ कि विजय बाहरी नहीं, भीतर की होनी चाहिए। उस दिन के बाद उन्होंने शासन का अर्थ बदला—दमन नहीं, सेवा; भय नहीं, विश्वास; और अपने इस विचार को जीवन में उतारा, जिसके पास सब कुछ होते हुए भी शांति नहीं, वह निर्धन है; और जो कम में संतुष्ट है, वही वास्तव में सम्राट है।
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