भारतीय ज्ञान-परंपरा आनंद तक पहुंचने का मार्ग विवेक को मानती है। विवेक और आनंद के इस गहरे संबंध से विवेकानंद शब्द का अर्थ स्वतः स्पष्ट होता है, जिसे स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में प्रयोगात्मक रूप से सिद्ध किया।
आनंद जो हम सबको चाहिए, उसका मार्ग विवेक से जाता है। आनंद फल है, विवेक का उसका स्रोत। भारतवर्ष का पूरा दर्शन विवेक और आनंद जैसे व्यापक शब्दों में समाहित होता है। आज दुनिया में आनंद का संकट बना है, उसके पीछे विवेक का अभाव है। हम सच्चे विवेक और आनंद की तरफ कैसे लौटे, इस पर विमर्श करने का विवेकानंद जयंती से उत्तम कौन-सा अवसर होगा।
आनंद, जिसकी तीव्र चाह और तलाश मनुष्य करता है, वास्तव में कहां उपलब्ध है? भारतीय ज्ञान-परंपरा के अनुसार आनंद स्वयं मनुष्य तक चलकर आता है, पर तभी जब उसके पास वास्तविक विवेक हो। विवेक को अंग्रेज़ी के इंटेलिजेंस शब्द का रूपांतरण मान लेना भूल है। भारतीय परंपरा में विवेक मनुष्य की सोच-समझ की अत्यंत उच्च, व्यापक और बहुआयामी अवस्था है, जबकि इंटेलिजेंस का दायरा सीमित है। इसी कारण भारतीय ज्ञान-परंपरा आनंद तक पहुंचने का मार्ग विवेक को मानती है। विवेक और आनंद के इस गहरे संबंध से विवेकानंद शब्द का अर्थ स्वतः स्पष्ट होता है, जिसे स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में प्रयोगात्मक रूप से सिद्ध किया।
आज संसार में जो संताप और विलाप, भय और असुरक्षा बढ़ रहे हैं, उसका एक ही कारण है, विवेक की घटती शक्ति। जब विवेक घटे, तो आनंद की उम्मीद करना नादानी ही है। ऐसे में विवेकानंद का जीवन और विवेक से आनंद में उतरकर दिखाने के उनके व्यावहारिक अनुभव हमें राह दिखा सकते हैं। स्वामी जी का विवेक की शक्ति से सच्चे आनंद तक पहुंचने की यात्रा के साथ-साथ उनको इस नाम का पात्र माने जाने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है।
रुचिककर पहलू यह है कि अगर स्वामी विवेकानंद का नाम स्वामी विवेक ही होता, तो वो भी उनकी प्रतिभा को समाहित करने के लिए काफी था। पर भारतीय दर्शन के एक और खास शब्द आनंद वो अवस्था (जहां सुख से व्यक्ति उछलता नहीं और दु:ख में हल्का-सा विचलित नहीं होता) साथ में जुड़ने से तो नाम की सार्थकता और सबल हो गई। उल्लेखनीय है कि भारत में संतों का नया नामकरण करने और नाम के साथ आनंद जोड़ने की तो परंपरा पहले रही ही थी, दीक्षा के समय। लेकिन विवेकानंद के संदर्भ में तो चीजें बहुत अनूठी हुई क्योंकि उन्हें स्वामी रामकृष्ण का शिष्य बनने के समय तो कोई नया नाम दिया ही नहीं गया था और खुद राम कृष्ण परमहंस के नाम संग भी आनंद नहीं जुड़ा था।
काफी लोग मानते हैं कि उनके गुरु ने उन्हें यह नाम दिया, जबकि वास्तविकता यह है कि नाम तो किसी और ने दिया। स्वामी रामकृष्ण तो उन्हें नरेन कहकर पुकारते थे। और रुचिकर पहलू यह कि संन्यासी जीवन की शुरुआत में उन्हें विविदिशानंद कहने का उल्लेख मिलता है। यानी जानने की तीव्र इच्छा वाला। चयन तो यह भी श्रेष्ठ था। पर पूर्णता तो विवेकानंद नाम पर हुई। उनको यह नाम राजपूताना के खेतड़ी के नरेश अजीत सिंह ने दिया। जब स्वामी जी विदेश की यात्रा पर जाने वाले थे, तो उनकी यात्रा के खर्च का प्रबंध खेतड़ी के नरेश ने किया और उनको न जाने क्या विचार आया, उन्होंने कहा कि इतनी अद्वितीय प्रतिभा जो भारत के अध्यात्म चिंतन को पूरे विश्व को अवगत कराने जा रहा है। उनका नाम भी अद्वितीय होना चाहिए। इस नामकरण के घटनाक्रम का उल्लेख फ्रंासीसी लेख रोमां रोलां ने अपनी किताब ‘द लाइफ ऑफ विवेकानंद एंड द यूनिवर्स गोस्पल’ में खूबसूरती से किया है। दरअसल नरेश अजीत ने नरेंद्रनाथ उर्फ विविदिशानंद की चीजों को अलग-अलग करके और अलग-अलग तर्क से परखने की क्षमता के कारण उन्हें यह नाम दिया। और शास्त्र की दृष्टि से देखें तो विवेक का क्रियात्मक रूप विविनक्ति है अर्थात वो स्पष्ट दृष्टि जो चीजों को उनके भिन्न-भिन्न रूपों को भिन्न रूप में जानता है और समझता है। जो किसी भी चीज के बारे अनावश्यक निष्कर्ष नहीं निकालता। और जिसे जीवन के संतुलन का पूरा ज्ञान है।
वाकई खेतड़ी नरेश की परिकल्पना सिद्ध हुई और विवेकानंद भारतीय अध्यात्मक और चिंतन के पुनर्जागरण का अग्रदूत बने और विश्व पटल पर गहरी छाप छोड़ी।
विवेकानंद का आध्यात्मकिक चिंतन बहुत अलग तरह का रहा। उन्होंने कहा कि पूजा पाठ करें, लेकिन वहीं तक सीमित नहीं रहना। आध्यात्मिकता, गरीब, मजदूर और जरूरमंद की सेवा में झलकनी चाहिए। जब तक यह नहीं करते तब तक तो अध्यात्म की थ्योरी ही आपके पास है, उसका प्रैक्टिकल नहीं हो पाता। उनका आध्यात्मिक दर्शन में देश और समाज की समस्याओं को हल करने में जुटना भी शामिल है। कट्टरता किसी भी रूप में स्वीकार नहीं। फिर वे कहते हैं कि गरीबी, दरिदता में कोई अध्यात्म घटित नहीं हो सकता। इस तरह जीवन में आनंद घटित होने का प्रश्न ही नहीं। और उधर पश्चिम को जाकर समझाया कि तुम भौतिकता के जिस शिखर की तरफ भाग रहे, वो अति तुम्हे सच्चे आनंद का पात्र ही नहीं बनने देगी। यानी भौतिकता का संतुलन ही सही है- न कम न ज्यादा। वे अध्यात्म के नाम पर पूरे संसार की सूचनाओं और उनके मंथन से कटने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने बताया कि साइंस के विकास और दुनिया की घटनाओं से भी जुड़ना और उसमें दूसरों के तर्क को सुनना जरूरी है। उसमें अपना तर्क रखना भी शामिल है। वे अध्यात्म सिद्धांत के साथ व्यावहारिकता लाए। उनकी नीरक्षीर विवेकपूर्ण निर्णय शक्ति निकलने तर्क ने अध्यात्म के वर्जन का शुद्धीकरण किया। उल्लेखनीय है कि आज अध्यात्म की तरफ जाने वाले लोगों की संख्या तो बढ़ रही है, पर विभ्रम की स्थिति भी बढ़ रही है।
विवेकानंद जयंती युवा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। लेकिन युवाओं को ध्यान रखना चाहिए कि विवेकानंद युवा अवस्था के नाम पर अल्हड, बच्चे, नादान बने रहने के पक्ष में नहीं थे। उनके लिए युवास्था का अर्थ वो था जिसमें कोई मेच्योर होने के लिए अध्ययन, मनन चिंतन और समाज में अपनी भागीदारी करने में खुद को झोंक दे।
इस तरह विवेकानंद देश-विदेश में अपने आख्यानों से जिनकी पूरा बड़ा विवरण ‘कंपलिट वर्कस ऑफ स्वामी विवेकानंद’ में मिलता है, जिसमें वे स्पष्ट कर देते हैं कि जीवन में किसी भी रूप में अति हमें किस नर्क में झोंकती है। और इस अति से बचने के लिए किस तरह विवेक हमारा साथी है, उसकी खुली किताब उनका खुद का जीवन है। आज मनुष्य को कभी तकनीक पर निर्भरता की अति भटकाती है तो कभी भौतिकता और शक्ति अर्जित करने की अति तो कभी विज्ञान के नाम पर भी मनुष्य एक अति की तरफ बढ़ रहा है। वहां विवेकानंद से ही मनुष्य विवेक का प्रशिक्षण ले सकता है।

