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गुरुता की पराकाष्ठा

एकदा

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एक बार दो पंडित दादू जी का सत्संग सुनने और उन्हें गुरु बनाने की इच्छा से उनके पास पहुंचे। जब वे उनकी कुटिया के पास पहुंचे, तो रास्ते में एक आदमी नंगे सिर बाहर जा रहा था। पंडितों ने इसे अपशकुन समझा और अपशकुन टालने के लिए उस आदमी को दोनों हाथों से थप्पड़ मार दिए। फिर उन्होंने पूछा, ‘दादू साहिब का डेरा कहां है?’ आदमी ने अंगुली से इशारा करते हुए कहा, ‘वह रहा।’ जब वे डेरे में पहुंचे, तो पता चला कि दादू साहिब बाहर गए हुए थे। पंडितों ने इंतजार किया। जब दादू जी लौटे, तो पंडितों ने देखा कि ये तो वही आदमी है, जिसे उन्होंने थप्पड़ मारे थे। यह देखकर दोनों थर-थर कांपने लगे, लेकिन दादू साहिब हंसते हुए बोले, ‘लोग दो टके की माटी की हंडिया लेने से पहले उसे टक्कर मारकर देखते हैं, तुम गुरु धारण करने आए हो, तो खूब छककर टकोरो। जब दिल माने, तभी गुरु स्वीकार करो।’

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